जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया” के दोहा : करम

करम सार हावय इँहा, जेखर हे दू भेद।
बने करम ला राख लौ, गिनहा ला दे खेद।

बिना करम के फल कहाँ, मिलथे मानुष सोच।
बने करम करते रहा, बिना करे संकोच।

करे करम हरदम बने, जाने जेहर मोल।
जिनगी ला सार्थक करे, बोले बढ़िया बोल।

करम करे जेहर बने, ओखर बगरे नाम।
करम बनावय भाग ला, करम करे बदनाम।

करम मान नाँगर जुड़ा, सत के बइला फाँद।
छीच मया ला खेत भर, खन इरसा कस काँद।

काया बर करले करम, करम हवे जग सार।
जीत करम ले हे मिले, मिले करम ले हार।

करम सरग के फइरका, करम नरक के द्वार।
करम गढ़े जी भाग ला, देवय करम उजार।

बने करम कर देख ले, अड़बड़ मिलथे मान।
हिरदे घलो हिताय बड़, बाढ़े अड़बड़ शान।

मिल जाये जब गुरु बने, वो सत करम पढ़ाय।
जिनगी बने सँवार के, बॉट सोझ देखाय।

हाथ धरे गुरुदेव के, जावव जिनगी जीत।
धरम करम कर ले बने, बाँट मया अउ मीत।

करम जगावय भाग ला, लेगय गुरु भवपार।
बने करम बिन जिन्दगी, सोज्झे हे बेकार।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को (कोरबा)








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