सुरता – गीत संत डॉ. विमल कुमार पाठक

इतवार १४ जुलाई, २०१३ के संझा वीणा पाणी साहित्य समिति कोती ले पावस गोस्ठी के आयोजन, दुर्ग म सरला शर्मा जी के घर म होइस. कार्यक्रम म सतत लेखन बर छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अधियक्छ पं.दानेश्वर शर्मा, जनकवि मुकुन्द कौशल, हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका डाॅ.निरूपमा शर्मा, संस्कृत हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका शकुन्तला शर्मा के सम्मान समिति ह करिस. ये अवसर म डॉ. विमल कुमार पाठक के घलव सम्मान होवइया रहिसे फेर डाॅ.पाठक कार्यक्रम म पधार नइ पाइन. कार्यक्रम बर डाॅ.पाठक के उप्पर लिखे मोर आलेख गुरतुर गोठ के पाठक मन बर प्रस्तुत हावय –

हमर जइसे कबके उबजे कोलिहा का जाने खलिहान मन के सामरथ म डॉ. विमल कुमार पाठक के व्यक्तित्व अउ कृतित्व के उपर बोलना आसान नइ हे. तभो ले हम बोले के उदीम करत हन आप मन असीस देहू. एक मनखे के व्यक्तित्व के महत्व अउ ओखर चिन्हारी अलग अलग लोगन मन बर अलग अलग होथे. इही अलग अलग मिंझरा चिन्हारी ह ओखर असल व्यक्तित्व के चित्र खींचथे. जइसे हमर मन बर ‘राम‘ ह भगवान रहिस त केवटराज बर ‘पथरा ला मानुस बनईया चमत्कारी मनखे‘, परसराम बर धनुस ला टोरईया लईका.. आदि इत्यादि. त छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के प्रमुख आन्दोलनकारी, भिलाई स्पात संयत्र के माध्यम ले छत्तीसगढ़ के लोक कला ला एक नवा आयाम देवईया अधिकारी, साहित्यकार, ख्यात मंचीय कवि, प्रखर पत्रकार, डॉ.विनय कुमार पाठक के बड़े भाई डॉ. विमल कुमार पाठक.. आप बर अउ मोर बर अलग अलग आय.

उंखर व्यक्तित्व के आंकलन मोर हिरदे म एक समग्र मानव के रूप म हावय जेखर हिरदे म प्रेम, दया अउ सहानुभूति हे. सबले बड़े बात के उमन आज तक ले तप करत हांवय, दुखमय जिन्दगी के बावजूद मुस्कान ढ़ारत रचनासील हांवय ये मोला बड़ नीक लागथे, उंखर इही व्यक्तित्व हम युवा मन ला प्रेरणा देथे. डॉ. पाठक जी कोनो जघा ये बात ला लिखे घलो हांवय के चलते रहो चलते रहो.

मैं दू-तीन बरिस पहिली जब उंखर मेर मिले उंखर घर गे रेहेंव तेखर पाछू अपन ब्लॉग म उंखर बारे म लिखे रेहेंव के छत्तीसगढ के नामी साहित्यकार डॉ. विमल कुमार पाठक पाछू कइ बछर ले अडबड गरीबी म दिन गुजारत हांवय. उखर हाल देख-सुनके मोला दुख के संग अति अचंभा होइस. सरलग गिरे हपटे अउ बीमारी म पानी कस पइसा बोहाए के पाछू आजकल डॉ. पाठक छत्‍तीसगढ सासन कती ले साहित्‍यकार मन ला मिलत मानदेय अउ पत्र-पत्रिका मन म प्रकासित लेख के मानदेय म अपन गुजारा करत हावय. एक समय रहिस जब डॉ. पाठक भिलाई स्पात संयंत्र के प्रसार अधिकारी रहिन तब उनखर नाम के डंका चारो मूडा लोक कला अउ साहित्‍य के पुरोधा के रूप म बाजय. जम्मा संसार म लोहा उदगारे बर बजरंगा भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग के माइ मूड के अब का हाल हावय येला आप मन सब देखते हावव, वैभवपूर्ण पद म काम करे डॉ. पाठक ये हाल म घलव पहुंच सकते हें, विस्वास नइ होवय, फेर इही नियति आय.

आप सब मन ये समय के फेर जानत हावव, अउ इहू जानत हावव के डॉ.पाठक जी ल ये सबके चिंता नइ हे, ना वो ह ये बात ला सोंचय. समय ले जूझत डॉ.पाठक जी के जीवन निराला जइसे कठोर हो गे हावय जेखर भीतर ले संवेदना रूपी गीत मन के उलुव्हा पीका लगातार फूटत हावय.

अब गोठ बात डॉ. पाठक के साहित्यिक व्यक्तित्व के, त पाठक जी के रचना यात्रा बड़ लम्बा हावय. देस भर म कवि सम्मेेलन के मंच, रेडियो, टीबी मन म छत्तीसगढ के धजा फहरावत, पेपर गजट मन म छपत लगभग ३० किताब के प्रकासन तक, डॉ.पाठक जी के लिखइ आज तक ले चलत हावय. डॉ.पाठक जी हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दूनों भाषा म लिखथें, साहित्य सृजन बर उंनला कोरी कोरी पुरस्कार अउ सम्मान मिले हावय.

उंखर रचना यात्रा म गद्य अउ पद्य दू विधा देखे बर मिलथे, मोर उंखर गद्य ले भेंट प्रखर समाचार म छपत सरलग कड़ी “कहां गए वे लोग” ले होइस. ये कड़ी अंदाजन ६० ठन छपिस, जेमा हमर पुरखा मन के मान बढ़इया हमर सियान मन के बारे म पाठक जी ह बड़ सहज अउ सरल ढ़ग ले लिखे हांवय. ये कड़ी पाछू म एक किताब के रूप म “छत्तीसगढ के हीरे” के नाव ले छपिस. जीवन परिचय जइसे सहज लेखन ला रूचिकर बनाये के कला ये किताब म देखे बर मिलथे. समाज, संस्कृति, परम्परा अउ इतिहास संग परिस्थिति के ताना बाना जोड़त डॉ.पाठक जी ह भूले बिसरे सियान मन के जउन गौरव गाथा लिखे हांवय वो ह छत्तीसगढ़ के एतिहासिक दस्तावेज बन गए हावय. ये अकेल्ला एक ठन किताब ह उंखर लेखन ला अमर करे के समरथ रखथे.

मैं डॉ.पाठक जी के जम्मो रचना ला पढे सुने त नइ हंव, फेर जतका ला पढे सुने हांवव ततकेच म मोर हिरदे म उखर संवेदनसील कवि के व्यक्तित्व परखर रूप म उभर के सामने आथे. डॉ.पाठक जी गीत कवि आंए, उमन परम्परा ले जुरे प्रेम, सौंदर्य अउ दर्सन के गीत लिखथें. उमन हिंदी गीत मन म घलव हमर आंचलिक संवेदना ला उभार के आघू लाथें. इंखर कविता म स्‍वर साधना अउ छंद-योजना लाजवाब रहिथे. इमन अपन रचना म गौ भक्ति अउ आध्यात्मिकता के सुर तको भरे हांवय जउन मन म बाबा सिरीज के गीत मन ला छांट दन त बांचे मन एके नजर म कखरो मान खातिर बनाये नजर आथे, सिरजे के भाव अउ अंतस के पीरा जइसे उंखर सौंदर्य अउ बिरोधी स्वर के गीत मन म हावय वो उमन म नइ हे.

अपन बिरोध के कविता मन म डा. पाठक दलित, किसान अउ कमइया मन के दुख ला सुर देवत समाज के बुराई अउ अनीत उप्पर तेल डार डार के खंडरी घलो निछथें. कोन जनी कब आही नवा बिहान म इमन कहिथें –
नेता मन बेंच डारिन अपन इमान,
कोन जनि कब आही नवा बिहान!
अफसर बेपारी मन बनके मसान,
पीस डारिन जनता ला,
कर दिन पिसान.
दमित सोसित मनखे के पीरा ह इनला अतका अंतस ले जियानथे के इही गीत म आघू कहिथें –
नइ तो फेर हम उठाबो धनुस, जहर बान,
मरकनहा मन के हम लेबोन परान.
ये कवि के हिरदे ले उदगरे अकुलइ ये, जहर बान धरइया मन के जल जंगल जमीन जब छिनाही त इही बात होही.

अइसन वामपंथी सुर के संगें संग इंखर छत्तीेसगढ़ी कविता मन म लोक जीवन के उभार घलो रहिथे, प्रेम, सौंदर्य, श्रृंगार, प्रकृति के संग इमन जनजीवन ल अपन गीत म बहुत सुघ्घर रंग म उतारथें-
चंदा झाकै चनैनी,
लरजत गरजत रात म.
धान के हरियर लुगरा पहिरय,
धरती हर चौमास म.
येमा चंदा के चनैनी ल झंकई अउ रात के लरजई गरजई संग देह के भाषा के मानकीकरन देखव, आघू इही गीत म कवि कहिथें- चूमा लेवय हवा, लजावय खेत खार हर, सांस म. अइसनेहे सौंदर्य के चित्र कवि अपन अडबड अकन गीत मन म कोनो मूर्तिकार कर गढे हावयं, तेन म कोनो कोनो जघा अतिरंजन घलो हो गए हे तइसे कस लागथे-
फरकय अंग अंग तोर अमरित,
पीके मैं हर गएंव मताय,
टिप टिप भरे रखे हस करसी,
दू ठो छाती म बंधवाए.

भक्ति, प्रेम सौंदर्य के पाछू कवि के प्रिय विसय प्रकृति आय, प्रकृति के दुख ला गोहरावत कवि पानी जइसे आम अउ खास जिनिस बर एक ठन लम्बा गीत रचथे जेमा पानी के सहारे जीवन ला जोरथे जउन म जवानी के घुरे ले पानी के महमहइ के बरनन करथें-
महर महर महकत मम्हावत हे पानी ह,
लागत हे घुरगे सइघो जवानी ह.
अइसनेहे प्रकृति के बरनन करत कवि छत्तीसगढी के सटीक सबद मन के घलो प्रयोग करथें जउन हा एक नजर म भले अटपटा लगथें फेर जब दूसर पइत सुनबे त सार बात समझ म आथे कि कइसे कवि ह पानी बरसइ ला लंगझग लंगझग कहिथे, फेर उही पानी जब नरवा नदिया तरिया म बरसथे त झिमिर झिमिर अउ रद रद रद पानी बरसइ के अंतर समझ म आथे.

अइसनेहे कइ ठन गीत हावय जउन कवि के कविता के असल सास्त्रीय रूप के बखान करथे. सबद मन के बाजीगर ये कवि ह अपन अउ समाज के अभी के हालत उप्पर कोनो कोनो जघा दुखी दिखथें, फेर अपन गीते म उमन येला फलियार के कहिथें कि कवि निरास बिल्कुल नइ हें उनखर आसा के डोर उखंर अडबड अकन गीत मन म परगट होये हे. उमन आवाज लगावत हें सब ला जुरमिल के ये संकट के घरी ला टारे बर-
आवव अधिंयारी ला मेटन,
हम पिरथी के बिटियन बेटन.
अपन मया के तेल अउ बाती,
चलव जलावन हम सरी राती.
आपो मन हरदम सुख पावौ,
सुख ला बांट बांट बगरावव.
दीया सही सुघ्घर बरके,
घर घर म अंजोर बरावव.
उंखर इही आसावादिता हमर मन बर प्रेरना आए अउ इही उखंर व्यक्तित्व अउ कृतित्व के सार आए.

संजीव तिवारी

पूर्व में यहां प्रकाशित इस आलेख को आज उनकी जयंती पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है।
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