छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

1.

जब भट्टी मा आथे मनखे।
जीयत ओ मर जाथे मनखे।

अब गाँव उजर गे शहर खातिर,
का खाथे का बँचाथे मनखे।

लालच के चारा ला देख के,
मछरी कस फँस जाथे मनखे।

समय निकलथे जब हाथ ले,
माथा पीट पछताथे मनखे।

अपन दुख काकर संग बाँटे,
पीरा ला भुलियाथे मनखे।

भुलियाथे=सांत्वना देता है

2.

मनखे ला धकिया ले दाऊ।
पुन तैं गजब कमा ले दाऊ।

धरती मा तो रतन गड़े हे,
अपनो धन गड़िया ले दाऊ।

छत्तीसगढ़िया सिधवा हावै,
उनला तैं भरमा ले दाऊ।

जेकर भाग म बिपत लिखे हे,
थोरिक तहुँ थपरा ले दाऊ।

करम गजब तैं कर दुनिया मा,
अंत काल पछता ले दाऊ।

मान ‘बरस’ के कहना ला तैं,
संग गहूँ रँमजा ले दाऊ।

मनखे = मनुष्य (सज्जन व्यक्ति) पुन = पुण्य, गहूँ = गेहूँ, रँमजा ले = पीस जा।

3.

मनखे गजब अलाली करथे।
बइठे – बइठे जुगाली करथे।

फुर्सत मा हे लागथे मोला,
आज करना हे, काली करथे।

बूता कौनो जोंग दे तहने ,
झट ले ओ हर उदाली करथे।

चौकीदार हर चोर कहा गे,
का चोर मन रखवाली करथे?

थोरच्च दिन के जिनगी हे जी
पर, काकर बर हमाली करथे।

बूता = कार्य, जोंग दे = निर्देशित कर दो, तहने=तो, उदाली = विरोध/अवमानना, काकर बर = किसके लिए

बलदाऊ राम साहू

संघरा-मिंझरा

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