गज़ल

बदलगे तोर ठाठबाट अउ बोली,गोठियात हे सब झन ह
मंदरस कहां ले बरसय ,करेला कस होगे हे जब मन ह

पोत के कतको कीरिम पवडर,सजा ले अपन बाना ल
नइ दिखय सुघ्घर मुरत तोर, जब तड़के रइही दरपन ह!

चारों खुंट लाहो लेवत हे, बड़े बड़े बिखहर बिछुरी सांप
संगत म अब सुभाव देख,बदले कस दिखत हे चंदन ह

भोकवाय गुनत रही जाबे, देख नवा जमाना के गियान
सियानी धराके नान्हे हांथ कलेचुप बुलकत हे ननपन ह

बिरथा हो जाही पोसे तोर,मन म अकल के घोड़ा घमंड
सुधबुध सबो गंवा जाही,जब गोड़ तरी आही अलहन ह

अपने मुड़ी गिरही पथरा,लगाबे निशाना कहूं बादर ल
अंधियारी रतिया लालच के,भटकत कलपही नरतन ह

ललित नागेश
बहेराभांठा(छुरा)



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