संतान के सुख समृद्धि की कामना का पर्व- हलषष्‍ठी

वीरेन्द्र ‘सरल‘
संसार में हर विवहित महिला के लिए मातृत्व का सुख वह अनमोल दौलत है जिसके लिए वह कुबेर के खजाने को भी लात मारने के लिए सदैव तत्पर रहती है। माँ अर्थात ममता की प्रतिर्मूत, प्रेम का साकार स्वरूप, त्याग और बलिदान की जीवन्त प्रतिमा। माँ षब्द को चाहे जितने उपमान देकर अलंकृत करने का प्रयास किया जाये पर माँ के विराट व्यक्तित्व के सामने सब बौने सिद्ध होते है। माँ सदैव अपने संतान के सुख समृद्धि की कामना करती है इसके लिए उसे चाहे जीवन में कितना भी कश्ट क्यो न उठाना पड़े।
यदि हमारा देष धर्म प्रधान देष है तो हमारी यह छत्‍तीसगढ़ की पावन भूमि धर्म को पूर्णतः आत्मसात करने वाली धरती है। यहाँ एक ओर माताएं जहाँ पति के लम्बी उम्र के लिए हरीतालिका अर्थात तीजा का कठिन व्रत रखती है तो दूसरी ओर संतान के सुख-समृद्धि और लम्बी उम्र के लिए हलश्श्ठी अर्थात कमरछठ का व्रत रखती है। चूंकि यह पुत्र लिए रखा जाता है इसलिए इसे पुत्रेश्ठी व्रत भी कहा जाता है।
माताएं इस व्रत को भादो माह के कृश्ण पक्ष के छठ के दिन रखती है। कथा के अनुसार इसी दिन भगवान बलराम का जन्म हुआ था। उसके षस्त्र के रूप में हल को मान्यता मिली है इसलिए इसे हलश्श्ठी व्रत भी कहा जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार इसी व्रत को रखकर माता गौरी ने कार्तिकेय को पुत्र के रूप में प्राप्त की थी। जिसकी पत्नी का नाम शश्ठी था इसलिए इसे पुत्रेश्ठि व्रत भी कहते है। कहा जाता है कि सतयुग में समुद्र नाम का एक राजा था जिसकी पत्नी का नाम सुवर्णा था। उसका एक हस्ति नाम का पुत्र था जिसकी मृत्यु अल्पायु में ही हो गई थी। जिसके कारण राजा-रानी विलाप करने लगे थे। तब शश्ठी देवी प्रकट होकर भादो माह के कृश्ण पक्ष के छठ को व्रत रखने पर उसके पुत्र को जीवित कर देने की बात कही। रानी ने इसका पालन किया और जिससे उसका पुत्र जीवित हो गया।
शश्ठी देवी को लक्ष्मी स्वरूपा माना जाता है। लक्ष्मी जी की उत्पिŸा सागर से हुई है। इसलिए इस व्रत में सगरी पूजा का विधान है। चूंकि माता गौरी ने यह व्रत सागर किनारे सम्पन्न किया था। इसलिए इस व्रत में पूजा के समय प्रतीकातमक रूप से सगरी के पास पलाष के डंठल, महुआ के फल तथा लाई छिड़कने का भी विधान है। यहां पर षिव और पार्वती जी की भी पूजा की जाती है इसलिए षिव के नाग देवता के लिए दूध और धान की लाई भी चढ़ाया जाता है।
इस व्रत में केवल भैंस दूध का ही उपयोग किया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन देवताओं ने तांत्रिक विधि से भैंस की उत्पिŸा की थी। इसीलिए भैंस दूध और घी का उपयोग इस व्रत के लिए किया जाता है।
इस व्रत को रखने वाली माताओं के लिए हल चले जमीन पर पांव रखना व उससे उत्पन्न किसी भी प्रकार के अनाज का उपयोग करना निशेध है। इसलिए इस दिन बिना हल चले भूमि से उत्पन्न चांवल जिसे स्थानीय भाशा पसहर चाऊंर कहा जाता है तथा छः किस्म की भाजी जिसमें मुनगा भाजी का विषेश महत्व है, का प्रयोग किया जाता है।
इस दिन व्रती माताएं दिन भर व्रत रखने क बाद षाम के समय स्थानीय व्यवस्था के अनुसार निर्मित सगरी के आस-पास इक्ट्ठा होकर विधि-विधान से सगरी पूजा करती है। पुत्रवती माताएं अपने पुत्र की सुख-समृद्धि की कामना करती है मगर जिनको अभी पुत्र की प्राप्ति नही हो पाई है ऐसी माताए कुष को हाथ में लेकर अपने अँगूठे और एक अंगुली के बल पर गांठ बांधती है। ऐसा माना जाता है कि एक पल वह जितना गांठ बांध लेती है उसको उतने ही पुत्र की प्राप्ति होती है। पूजा स्थल से घर लौटने बाद माताएं पीली पोती जिसे षष्‍ठी देवी की ध्वज स्वरूप माना जाता है उसे अपने पुत्र या परिवार के अन्य सदस्यो के पीठ पर मारती है। इसके पीछे मान्यता यह है कि पीठ पर अधर्म का वास होता है जो पीली ध्वज के प्रहार से नश्ट हो जाता है और मनुश्य धर्म के अनुसार आचरण करता है। सगरी पूजा के समय छत्‍तीसगढ़ के गांवो में माताएं जो कमरछठ कथा कहतीं है। वह इस प्रकार है-




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *