पितर पाख मा पुरखा मन के सुरता : हरि ठाकुर

व्‍हाट्स एप ग्रुप साहित्‍यकार में श्री अरूण कुमार निगम भईया ह पितर पाख मा पुरखा मन के सुरता कड़ी म श्री हरि ठाकुर के कविता प्रस्‍तुत करे रहिन हे जेला गुरतुर गोठ के पाठक मन बर सादर प्रस्‍तुत करत हन –

दिया बाती के तिहार
होगे घर उजियार
गोरी, अँचरा के जोत ल जगाये रहिबे ।

दूध भरे भरे धान
होगे अब तो जवान
परौं लछमी के पाँव
निक बादर के छाँव
सुवा रंग खेतखार, बन दूबी मेढ़ पार
गोई, फरिका पलक के लगाये रहिबे ।

जूड़ होगे अब घाम
ढिल्ला रात के लगाम
आंखी सपना के घर
मन, देवता के धाम
करे करे हे सिंगार, खड़े खड़े हे दुआर
गोई, मया के भरम में ठगाए रहिबे ।

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टोनही अस झूपत हे
बिरबिट रतिहा घलो पहा जाही
आही सुरुज सजे दूल्हा कस
अउ दिन के मुंह उजरा जाही
सुरुज के आंखी मं
झुलत हे सपना नवा बिहान के
बेरा नव निरमान के ….।
कइसे बारव दिया बतावव , नइये तेल अउ बाती
सांस के आरी जिनगी चीरथे , गुंगुवावत हे छाती ….।

Hari Thakur Chhattisgarh

हरि ठाकुर

चर्चा –
संजीव तिवारी: ढिल्ला रात के लगाम, ये प्रतीक प्रयोग असहज हे। कवि एखर ले का कहे चाहत हे सरलग समझ म नई आत हे।
अरूण कुमार निगम: दिन मा घाम के राज रहिस, जूड़ ऊपर रात के अधिकार रहिस। अब घाम कमजोर पड़त हे अउ जूड़ अपन डेरा दिनमान घलो जमावत हे। अइसे लागत हे कि जूड़ ऊपर अब रात के लगाम ढिल्ला पड़त जात हे।
देवारी के आवत आवत मा मौसम परिवर्तन के संकेत आय। (मोर बुद्धि के अनुसार इही अर्थ समझ म आवत हे)
सरला शर्मा: मोर बिचार मं …जाड़ के दिन मं रात बड़े हो जाथे ,दिन छोटे तेकर डहर इसारा आय ।
संजीव तिवारी: ढिल्ला मन रात को बिना लगाम (मने खेती खार के चिंता बिना) सपना के घर म आथे। त मन देव धाम म सिंगार करत हे (मने कुलकत) हे। मन ह ये पद म कवि के सिरजन ल प्रभावित करे हे, कहि सकथन
अरूण कुमार निगम: संजीव भाई जे बातों मा दम हे , पूरा पद के अनुसार इही अर्थ होवत हे। हम दुए लाइन ला देखत रहेन
सरला शर्मा: भाई मन ! एकरे बर तो कहत हंव …एक पन्थ दुई काज होही ….पुरखा मन के साहित्य ल पढ़बो ,चर्चा करबो, सीखबो ।
कामेश्‍वर पाण्‍डेय: पुरखा मन के सुरता कर के मन हर गदगद होगे। सरला दीदी पितर पाख ल बढ़िया छेड़िन। हरि ठाकुर के गीत सोना म सुहागा कस लगिस। अरुण भाई छंद ल बताहा तो! अन्तिम पद म ढिल्ला रात के लगाम के मतलब सरला दीदी जउन लगावत हें, ओहर महूं ल जमत हे। माने रात के बड़े होवाई।

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