कती जाथन हमन

hema-sharmaआज हमर देस म, जेती देखव तेती, चारो कोती अराजकता दिखथे। अपन ला बड़े अउ सही बता के दूसर ला छोटे अउ नीचा दिखाना अब मनखे के स्‍वभाव बनत जात हे। घर-परिवार, समाजअउ राजनीति सब मा उहीच हाल हे। राजनीति म कुर्सी ह तो अइसे होगे हे जइसे लोमड़ी (कोलिहा) के अंगूर, हमला नइ मिलिस तो खट्टा हे (बने नइ ऐ)। जनता ह चुनाव के बेरा मा थोरकन रूपया, कपड़ा अउ दारू बर अपन वोट ला बेच देथे अउ बाद मा अपने चुने नेता के करनी बर रोथे। वाह रे नेता, अउ वाह रे जनता।
संविधान हा हमला बोट डारे के जउन अधिकार हमन ला देहे हे वो ह हमर सबले बड़े अधिकार आए। फेर उहू ला हमन बेच के गवां डारथन, अउ बाद मा नेता ला, राजनीति ला गारी देथन। नेता मन सेवा करे बर नेता बने हन कहिथे फेर जनता के सेवा कोनो मेर नई दिखेे, अपनेेच सेवा ला बने करथे। अउ तेनो मा भाग-भरोसा कोनो बने आदमी नेता बन जाथे तो ओखर पांव खिंचईया के कमी नइ ये। न हम करन, न दूसर ला करन दन वाले मन, हो-हल्‍ला करके  वोला बने काम नइ करन दंय।
जेन-जेन नियम ह बिकास बर बनाये गए रहिस हे, तेने अब विनास के रूप धर ले हे। अब देखव न, राजनीति के चक्‍कर म आरक्षन ला बोट बैंक बना डाले हे, ओखर दुष्‍परिणाम ला देख के घलव अनदेखा कर हें। जतका तक जरूरत हे ओतका तक तो ये ह बने हे फेर इही आरक्षन हा अब बिकराल रूप धर ले हे।  जेन ला देख तेने हा आरक्षन मांगत हे, जना-मना आरक्षन नइ भगवान के वरदान होगे। न हींग लागय न फिटकीरी अउ रंग सुघ्‍घर, अउ नइ देबे तो हड़ताल, धरना के बहाना, डरवा के लेहे के उदीम करत हें। मोर सोच म लोगन ये सब उदीम म जतका बेरा ल उरकावत हें उही बेरा ला पढ़े-लिखे मा लगावंय त समाज अउ देश के दशा-दिशा दुनो बदल जातिस।
सही मा तो आरक्षन होना ही नइ चाही, फेर कहूं, जरूरीच हे तो जातिगत आधार न करके आर्थिक आधार मा देवय तेन हर समाज बर सही होही। तभे सही आदमी सही जघा पहुंचही। अरे जेन बिना पढ़े-लिखे कम नम्‍बर पाके, डाक्टर, इंजीनियर बन जाही तेन दूसर ला का सिखाही-बताही।
बामहन अउ ठाकुर (सवर्ण) होना तो अब पाप होगे, मेहनत करके पढ़-लिख के बने नम्‍बर ला के घलव येमन पाछू हे। इनखर लईका मन नौकरी बर तरसत हें। ज्ञियानी मन ला गुनना चाहिए के का कोनो बाम्‍हन, ठाकुर गरीब नइ्र होवय, ओहू मन ला तो मदद के जरूरत हो सकथे? फेर न्‍याय बर कोनो नइ बोलय, नेता मन जान समझ के भी चुप रहिथे नहीं तो उखर बोट के का होही। ऐको झन मनखे अपन आत्मा म जागेे सच ला कहूंं बोल पाथे तो ओखर मरन हो जाथे, जनेमना का पाप कर डारिस तइसे। वोट के राजनीति वाले नेता मन अउ उखर चमचा मन ओखरे पुतला फूंकथें अउ जीना मुश्किल कर देथे।
सब पढ़य, सब बढ़य कहत-कहत एक ठन अउ नियम बनाये गीस के, कोनो पढ़ईया लइका ला आठवी कक्षा तक फेल नइ करना हे। अइसे करके शिक्षा ला अउ बोज दिन, ऐ नियम हा शिक्षा ला अइसे खोल डारिस जइसे गहूं ला घुन। एको अक्षर पढ़े लिखे नइ आवय अउ लईका हर साल पास होवथे, अइसन शिक्षा हा कउन काम के। अपन नाम लिखे बर नइ आवय अउ लईका पाचवीं आठवी पास हो जाथे, बाचे खोचे म ये आक्षरन।
तेनो मा वाह नियाय! कहूं मूंह ले सही बात निकलगे, कोनो पेपर टी बी वाले छाप दिस और दिखा दीस तो तो ओखर उपर गाज गिर जाथे। कउनो नेता अभिनेता सही बात ला हिम्मत करके कहू कहि देथे, तिंखर मन बर एक ठन नवा शब्द निकले हे, ‘असहिसुष्णता’। भले देश बट जाय फेर मुंह आंखी ला बंद रखव।
ऐही सबके सेतिक कहिथंंव के अउ कतका सहिबो, कतका गलत बात ला सून के देख के चुप रहिबो। एक दिन ऐ डर अउ चुप रहई हा पूरा समाज अउ देश ला नंपुसक बना देही। जिहा ले समाज अउ देश के विकास के कोई रस्ता नई बांंचही। देखते-देखत, ऐ घाव हा नासूर बन जही, अभी घलव बेरा हे, सोंंचव के केती जाथन हमन ……………..।

-श्रीमति हेमा शर्मा
आचार्या स.शि.मंदिर
कुसमुण्डा (कोरबा)

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