हीरा सोनाखान के

छत्तीसगढ़ी साहित्य के पद्य लेखन मा उत्कृष्ट लेखन के कमी हवय, छन्द लेखन म तो बिल्कुल नगण्य। येकर भरपाई – हीरा सोनाखान के (खंडकाव्य) करत हवय । ये खण्डकाव्य ला पढ़ेंव एक घव मा मन नइ माढ़ीस ता दुबारा-तिबारा पढ़ डारेंव। पंडित सुंदरलाल शर्मा के दानलीला के एक लंबा अंतराल मा खण्ड काव्य आइस जेन पूरा व्याकरण सम्मत अउ विधान सम्मत हवय। बीच-बीच मा खण्डकाव्य के इक्का दुक्का किताब जरूर आइस फेर व्याकरण अउ विधान म पूरा खरा नइ उतरिस । मितान जी के ये खण्डकाव्य विधान सम्मत अउ व्याकरण सम्मत हवय जेमा उपमा, अनुप्रास अउ अतिसंयोक्ति अलंकार के सुग्घर प्रयोग देखे बर मिलिस।

शहीद वीर नारायण के सौंदर्य (पुरुष श्रृंगार) के गजब के वर्णन मनीराम जी के काव्य कौशल ला दर्शाथे । अनुस्वार अउ अनुनासिक के बहुत ही बारीकी से प्रयोग मनीराम जी करे हवय । शब्द चयन सटीक अउ अर्थपूर्ण हवय। गाँव गँवई के नँदावत ठेठ देहाती शब्द मन ल लेखक सुग्घर प्रयोग करे हवय जेकर ले छ्न्द के सौंन्दर्य बाढ़गे हवय । खण्डकाव्य मा प्रयोग छत्तीसगढ़ी शब्द मन अवइया बेरा मा मानकीकरण के आधार बनही । ये बात के नँगते खुशी हवय कि छन्द लेखन के परंपरा छत्तीसगढ़ म पुनर्स्थापित होवत हे अउ छन्द लेखन मा नवा नवा प्रयोग भी देखे मा आत हे ।

शहीद वीर नारायण सिंह के गाथा वर्णन मा लेखक कुल 21 प्रकार के छ्न्द – दोहा, रोला, कुण्डलिया, अमृतध्वनि, सवैया, रूपमाला, गीतिका, आल्हा, त्रिभंगी,उल्लाला, हरिगीतिका, बरवै, सरसी, शक्ति, चौपाई, घनाक्षरी, शंकर, सार, विष्णुपद, छप्पय अउ सोरठा के प्रयोग करे हवय। मुख्य छन्द आल्हा हवय जेकर संख्या कुल 251 हवय । युद्धभुमि के अद्भुत वर्णन घनाक्षरी छन्द में हवय जेला पढ़बे त रोंवा-रोंवा खड़ा हो जाथे। आल्हा में गाथा के संगे संगे जनमानस मा देशप्रेम के भावना ल जागृत करे म घलो लेखक पूरा सफल होय हवय । अनुप्रास अलंकार के प्रयोग देखव-

तर्र तर्र तुर्रा मार, लाली-लाली लहू धार ।
खार-खाय खच-खच, चलै हो के चाँद गा।
छेदै छाती जोंग-जोंग,आल-पाल भोंग-भोंग।

आल्हा में अतिशंयोक्ति अलंकार के बानगी देखव –
सिंह के खाड़ा लहरत देखय,बइरी सिर मन कट जयँ आप।
लादा पोटा बाहिर आ जयँ,लहू निथर जय गा चुपचाप।

हीरा सोना खान के छत्तीसगढ़ी साहित्य म मील के पथरा बनही एमा रत्ती भर संदेह नइ हे। किताब के छन्द मन उत्कृष्ट अउ कालजयी होही अउ छत्तीसगढ़ी म छ्न्द लेखन के परंपरा ल पोठ करे के काम करे के काम करही। नवा रचनाकर मन ये किताब ल जरूर पढ़य उन ला नवा दिशा मिलही।

अजय “अमृतांशु”
भाटापारा

संघरा-मिंझरा

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