होली के दोहा

ब्रज मा होरी हे चलत, गावत हे सब फाग।
कान्हा गावय झूम के, किसम-किसम के राग।। 1।।

राधा डारय रंग ला, सखी सहेली संग।
कान्हा बाँचे नइ बचय, होगे हे सब दंग।।2।।

ढोल नगाड़ा हे बजत, पिचकारी में रंग।
राधा होरी में मगन, सखी सहेली संग।।3।।

गोकुल मा अब हे दिखत, चारो कोती लाल।
बरसत हावय रंग हा, भींगत हे सब ग्वाल।।4।।

लाल लाल परसा दिखय, आमा मउँरे डार।
पींयर सरसों हे खिले, सुग्घर खेती खार।।5।।

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तन ला रंगे तैं हवस, मन ला नइ रंगाय।
पक्का लगही रंग हा, जभे रंग मन जाय।। 6।।

छोड़व झगरा ला तुमन, गावव मिलके फाग।
आपस में जुरमिल रहव,खूब लगावव राग।।7।।

आँसों होरी मा सबो, धरव शांति के भेष।
मेल जोल जब बाढही, मिट जाही सब द्वेष।।8।।

कबरा कबरा मुँह दिखय, किसम किसम के गोठ।
मगन हावय सब भाँग मा, दूबर पातर रोठ।।9।।

मिर्ची भजिया देख के, जी अड़बड़ ललचाय।
छान छान के तेल मा, नवा बहुरिया लाय।।10।।

अजय अमृतांशु
भाटापारा
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