दिनेश चौहान के आलेख – कबीर जयंती बर विशेष : जन-मन म बसे कबीर

हिन्दी साहित्य के अकास म आज ले लगभग सवा छै सौ साल पहिली एक अइसे नक्षत्र के उदय होय रिहिस जेला हमन कबीरदास के नाँव ले जानथन। कबीरदास जी कवि ले बढ़के एक समाज सुधारक रिहिन। जउन सोझ-सोझ अउ खर भाखा म बात केहे के बावजूद हिन्दू अउ मुसलमान दुनो के बीच समान रूप म लोकप्रिय होइन अउ आजतक ले हवँय। ऊँखर पूरा जीवन विवाद के चादर म लपटाय मिलथे। कबीरदास जी के माता-पिता अउ जनम के बारे म निश्चित ढंग ले कुछ कहना संभव नइ हे। कोनो कहिथे के ऊँखर जनम चमत्कारिक रूप ले कमल के फूल म हो रिहिस तौ कोनो कहिथे वो एक विधवा बम्हनिन के गरभ ले पैदा होय रिहिस। जेला वोह लोकलाज के भय म लहरतारा नाँव के तरिया करा फेंक दे रिहिस। जेखर पालन-पोषण नीरू अउ नीमा नाँव के जुलाहा दंपती मन करिन। कबीर उही मन ल अपन माँ-बाप मानिन। कबीर के बाप करा अतका धन-दौलत नइ रिहिस के वोला पढ़ा-लिखा सकतिस। एकरे सेती वोला पुस्तक-पोथी के ज्ञान नइ मिल पाइस। धार्मिक सुभाव के सेती उन स्वामी रामानंद के चेला बन गिन। अपन जीवन के अनुभव अउ साधना के बल म उन अपार ज्ञान हासिल करिन। दूसर ज्ञानी अउ बिद्वान मन ल कबीरदास के कहना राहय-
“तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी”
दुनियाभर के पोथी-पुरान पढ़े के बजाय कबीरदास जी ढाई अक्षर के प्रेम के पाठ पढ़े बर जोर देवत केहे रिहिन-
“पोथी पढ़-पढ़ जग मुवा, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।। ”
कबीर दिखावा अउ आडंबर के कट्टर बिरोधी रहिन। माला जपना, टीका लगाना, मूर्ति पूजा, नमाज पढ़ना, रोजा रखना ये सब के बिरोध म उन दूनो कौम ल चेताय बर नइ छोड़िन-
“काँकर पाथर जोड़ के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, बहिरा हुआ खुदाय।।

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते या चाकी भली, पीस खाय संसार।।

मूड़ मुड़ाए हरि मिले, तो सब कोई लेय मुड़ाय।
बार-बार के मूड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय।।

ये उदाहरण ले साबित होथे के कबीर ल धरम म बंधाना मंजूर नइ रिहिस।

ऊँखर वाणी ल ऊँखर चेला मन कलमबद्ध करके दुनिया खातिर संजो के राखिन। तभे तो कबीरदास बर ये लाइन ह पर्याय बन गे हे-
मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
चारों जुग के महातम, कबिरा मुखहिं जनाई बात। ।

कबीरदास जी भक्तिकालीन कवि रिहिन। लोक कल्याण खातिर समाज म घटनेवाला घटना ल अतेक सहज अउ प्रभावी ढंग ले कबीरदास जी प्रस्तुत करँय के वोला सुने के बाद हर कोई गुने बर मजबूर हो जाय अउ आजो हो जाथे-

“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार के, मन का मनका फेर।।

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।। ”
कबीर के वाणी ल साखी, सबद अउ रमैनी छंद के रूप म संजोय गे हे जेन ‘बीजक’ के नाम से परसिद्ध हे। कबीर गुरू के महिमा के बड़ बखान करे हवँय। एक जघा गुरू ल भगवान ले ऊँच इस्थान दे हवँय तौ एक जघा कुम्हार से तुलना करे हवँय-

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियो बताय। .

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ गढ़ काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट। ।
कबीर के खर भाखा के सेती ऊँखर निंदा करइया मन के घलो कोनो कमी नइ रिहिस। फेर कबीर निंदा करइया मन ल अपन हितवा मानय-
“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

कबीर के जनम संवत् 1455 म काशी म होइस। पूरा जीवन काशी म बीतिस। जब मरे के पाहरो आइस तौ कबीर मगहर चल दिस। काबर? काबर के वो समय अइसे धारना रिहिस के काशी म मरे ले सरग अउ मगहर म मरे ले नरक मिलथे। ये धारना ल टोरे खातिर वो समय के खाँटी महात्मा अपन शरीर ल मगहर म तियागिन-
“क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा।
जो काशी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा।। ”
संवत् 1575 म ऊँखर शरीर तियागे के बाद ऊँखर लास बर घलो विवाद होगे। हिंदू मुसलमान दुनो अपन-अपन ले दावा करे लगिन। फेर अइसे मानता हे लास गायब होगे अउ लास के जघा म फूले फूल रखाय मिलिस।

कबीर बेधड़क सच बोलइया संत कवि रिहिन। उन कटु सत्य केहे म घलो नइ हिचकत रिहिन। मानवता ल सही रस्ता देखाय बर आज अउ हमेशा कबीर के जरूरत रइही।

दिनेश चौहान

संघरा-मिंझरा

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