छत्तीसगढ़ी कहानी : सजा

आज जगेसर कका ह बिहनिया ले तियार होके पहुंचगे रहय। “ले न भांटो कतका बेर जाबो ते गा!दस तो इंहचे बजा डारे हव।सगा मन घलो काम बुता वाला आदमी हरे ,कहूं डहर जाएच बरोबर हरे।” काहत रामसिंग ल हुदरिस।आज रामसिंग के बेटा अनिल बर छोकरी देखे बर जावत हे।दू झिन नोनी के पाट के बाबू हरे अनिल ह !दू बछर पहिली मंझली नोनी मोतिन के हांत पिंवरा डरीस। देखते देखत अनिल घलो काम बूता म हुसियार होगे अउ जाने सुने के लइक होगे ।बर बिहाव के संसो कोन दाई ददा ल नी राहय। फेर रामसिंग के धियान आज रेनु तनी हे।बड़े बेटी रेनु ।अठाईसवां बछर ल छुवत हे रेनु ह उमर म।रंग कारी होय के सेती आज तक कोनो छोकरा ओला पसंद नइ करिन ,अभी तक कुंवारी बईठे हे बपुरी नोनी ह।ननपन ले दई ददा के दिए सीख संस्कार ल समोके ,घर परवार के सनमान के खातिर काकरो संग उड़े भागे के सोचबे नी करे। अइसे नही के काम बुता नी करत होही,रंधना गढ़ना से लेके निंदई कोड़ई लुवई टोरई गाड़ी बईला सब म अघुवा ।कबे त घर धारन बरोबर घर ल बोहे रथे।




रेनु के अठारा बछर के पहुंचती म ओकर हांथ म हरदी रचाय के सपना रामसिंग देखत हे। फेर सपना सपनच होगे। कभू कभू रामसिंग अकेल्ला म उपर तनी देखत गोठियात रहिथे ” एको झिन कनवा खोरवा मोर रेनु बर भेज देते भगवान !फूल कस मुस्कात चेहरा उमर के घाम म अब अंइलावत हे।देखे नई सकाय! ओकर दरद ह भीतर भीतर कलपावत रथे। हर साल जइसन पाछु बखत घलो दरजन अकन सगा आइन फेर कोनो ल रेनु के कारी संवरेंगी काया ह नी सुहइस।मोतिन ल बिहईस तौन छोकरा घलो पहिली रेनु ल देखे बर आय रिहिस हे फेर वो ह मोतिन ल पसंद कर डारिस। जोन सगा रेनु ल देखे बर आवय वो ह मोतिन ल मांगय। रेनु के राहत ले मोतिन ल कइसे बिहा दंव? रामसिंग भारी गुना भागा म पर जाय ।फेर बाढ़े लइका ? अउ उपराहा ए दुनिया के टेड़गा नजर! समाज के रीति रवाज के डर के मारे अउ जगेसर कका के समझौना ल मान के मोतिन के बिदा ल करे रिहिस। नोनी लइका के अंवतरतेच दई ददा के मन म ओकर बिहाव के संसो समा जथे।




समे के संगेसंग ओकर लोरा बेसा सकेले के चालू हो जथे। जोखा करके संवागा सजई चलत रहिथे। परछी म माढ़े गोदरेज अलमारी जे ल ओकर कका ह रेनु के टीकावन बर जब ले सगा अवइ चालु होइस तब के जोरा करके राखे हे, अकाल दुकाल म सकबो की नी सकबो कहिके। अब अइसे लागत हे ,ओकरो उमर ह रेनु के उमर संग ढलत जात हे। मांझा म लगे दरपन म फुतका रचत जात हे।उही दरपन म रेनु कभू काल अपन चेहरा ल देख परथे त धरधर धरधर रोवासी फूट जाथे। संदुक म रखाय हांत के अंयठी ,गोड़ के सांटी ,घेच के माला उघारते साठ हीरू-बिछूरू अस चाबे ल दंउड़थे। बिहाव के जोखा म जोरे जिनिस अब तो बंबरी कांटा कस गड़त हे। का का सपना नी देखे रिहिस हे रेनु ह अपन बिहाव बर। फेर वो सपना अभी तक बदरंग हे,कोनो कारी जिनगी ल रंगीन बनाय बर नी खंधत हे। रेनु जतका झिन रिश्ता धरे के खातिर सगा मन ल चाहा पानी देवय,ओकर रंग ल देखते साठ सगा मन रेंगे बर धर लेवंय। रेनु आज घेरी बेरी पुछथे “मोला करिया रंग काबर देय भगवान!” बनाय तो बनाय ,किसमत मे एको झिन तो संग संगवारी लिख देते!महु मया पीरा के नदिया म नहा लेतेंव। नीते फेर कारी होय के का इही सजा आय? जेन ह समाज के नजर ल नइ सुहाय?

ललित नागेश
बहेराभांठा(छुरा)
४९३९९६



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