सियान मन के सीख: कथा आवय ना कंथली

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन अपन घर अउ पारा परोस के जम्मों लइकन मन ला एक जघा सकेल लेवय अउ जहॉ संझा होवय तहॉ कथा कहानी के दौर शुरू हो जावत रहिस हावय फेर शुरूवात कतका सरल तरीका ले होवय यहू हर अड़बड़ सोचे के बात हरै। घर में रांधे-पसाय के बुता घर के बहुरिया मन करय अउ दार-भात के चुरत ले कथा-कहानी कहे के बुता घर के बूढ़ी दाई, बबा नई तो फुफू दाई के राहय। कहानी के शुरूवात होवय-का बतावंव बेटा! कथा आवय न कंथली। जरै पेट के अंथली।। फेर धीरे ले कहानी के आरंभ होवय-“एक समय के बात रहिस हावय।“
जइसे ये लाइन हर कान में जावय जम्मों लइकन मन के संग में जम्मों सुनइया मन के कान हर खडे़ हो जावत रहिस हावय अउ धीरे-धीरे कहानी म अइसे रम जावत रहिन हावय के कब जेवन बन जावय अउ कब कहानी खतम हो जावय तेखर गम नई मिलय। कहानी के अंत होवय-“दार-भात चुरगे। मोर किस्सा पुर गे“ ले। अतका सुन के जम्मों लइकन मन खाय-पिये बर दउड़य। अउ खाय-पिये के बाद दसना में परे के बाद शुरू होवय सुने कहानी ला गुने के दौर। सुने कहानी के बारे में सोंचत-सोंचत कब नींद आ जावय पते नई चलय अउ नींद तब खुलय जब बिहनिया कुकरा बासय।
कतेक सुग्धर दिन रहिस हावय अउ कतेक सुग्धर रात। न कोनो चिंता न फिकर। लइकन मन ला नवा-नवा बात सिखाए के कतेक सुग्घर मनोवैज्ञानिक तरीका। फेर संगवारी हो आज घलाव सियान मन के बोली-बात हर अंतस म बसे हावय। अतेक दिन होगे विज्ञान हर अतेक तरक्की कर डारिस फेर सियान मन के कोनो बात हर गलत साबित नई होय हावय। अंत में हमन ला उॅखरे बात में लहुट के आयेच बर परथे। 31 जुलाई के दिन हमर देश के महान कहानी साहित्य के कल्पतरू अउ उपन्यास साहित्य के सम्राट मुंशी प्रेमचंद के जयंती के अवसर में उनला कोटि-कोटि नमन हावय जिंखर कहानी हर आज घलाव हमर मन के किताब में अंकित हावय। उॅखर कहानी में वो जादू हावय कि जउन एक बार मन लगाके पढ़ लिस या सुन लिय वो हर कभू भूला नई पावय।




सन् 1880 में काशी के जिला के लमही गॉव में जनमें मुशी प्रेमचंद के असली नाम धनपतराय रहिस हावय जउन कि उर्दु में नवाबराय अउ हिन्दी में प्रेमचंद के नाम से लिखत रहिन हावय। उॅखर लगभग 300 कहानी मानसरोवर नाम से आठ भाग में प्रकाशित होय रहिस हावय। बड़े भाई साहब, नमक का दरोगा, पूस की रात, पंच परमेश्वर जइसे कहानी आज घलाव हमर मन में समाय हावय। मुंशी प्रेमचंद के आरंभिक शिक्षा कांशी म होय रहिस हावय। मेट्रिक पास करे के बाद स्कूल में अध्यापक के पद में कार्यरत रहिन हावय फेर इलाहाबाद ले ट्रेनिंग ले के बाद सबइंस्पेक्टर के पद में रहिन हावय।
सन् 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ले प्रभावित होके सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिहिन अउ आजीवन स्वतंत्र लेखन करे लगिन। मुंशी प्रेमचंद के भाषा सहज सरल अउ सुबोध होय के सेती हमर अंतस मा समा जाथे। लोक जन-जीवन के दुख अउ पीरा ला उकेरे बर वो दुख अउ पीरा ला महसूस करे बर परथे। अपन पीरा ला तो सबे समझथे फेर जउन मन दूसर के पीरा ला समझथे अउ वो पीरा ला दुरिहा करे के उधिम करथे वास्तव में वही महामानव होथे। मात्र 56 बछर के उमर में सन् 1936 में महामना मुंशी प्रेमचंद महान कथाकार के स्वर्गवास होगे। आज उमन तो हमर बीच नई हे फेर उॅखर कथा कहानी उॅखर महामानव होय के आज घलाव सुरता देवाथे। उॅखर जयंती के अवसर में उनला शत् शत् नमन।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता
बिलासपुर

संघरा-मिंझरा

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