कलाकार के सबले बड़े दुसमन गरब हर होथे

सुप्रसिध्द लोकगायिका कविता वासनिक संग गोठ बात

kavita-vasnik

गांव के चौपाल ले निकल के हमर छत्तीसगढ़ी गीत संगीत अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मा छागे हावय। मोला सुरता हे सन् 1982 में जब मोर गाय गीत ‘पता दे जा रे पता ले जा गाड़ीवाला…’ पहिली बार पॉलीडोर कम्पनी ले रिकार्ड बन के बाजार मा आय रिहिस अउ बीबीसी लंदन के रेडियो में बाजे रहिस त छत्तीसगढ़िया मन के छाती हर बड़े-बड़े सोंहारी कस फूल गे रिहिस। ये गीत हर राइपुर दूरदर्शन केन्द्र के उद्धाटन के बेरा म तको बाजे रहिस।’
छत्तीसगढ़ी लोकगीत संगीत के संगे संग ‘पानी बचाओ अभियान’ म सबले आगू रहइया लोक गायिका के नाव कविता वासनिक आय। गरीबी म पल बढ़ के आज लोककला यात्रा के चालीस बछर पूरा करत-करत कविता हर छत्तीसगढ़ सरकार के ‘पानी बचाओ अभियान’ म राजनांदगांव जिला के मोहरा गांव म बोहावत शिवनाथ नदी के पानी ल बचाय बर नदिया के तीर सटे अपन एक एकड़ उपजाऊ कीमती जमीन ल खुसी-खुसी दान दे दीस। मोर जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ म अइसन कोनो लोक गायिका के तरफ से अतेक बड़ दानसिलता के एहर पहला उदाहरण आय।
18 जुलाई 1962 में कविता के जनम भरकापारा राजनांदगांव निवासी स्वर्गीय रामदास हिरकने जी के निर्धन परिवार म होय रहिस। दूब्बर पातर अउ संकोची सुभाव के नोनी ल देख के कोनो सोंचे भी नइ रहिस के एक दिन इही ननकी चिरैया हर छत्तीसगढ़ी लोकगीत के कोकिला बन जाही। फेर कहिथे न कि पूत के पांव पालना मा दिखे लागथे। कविता के पिता हिरकेन जी हर ओखर जादुई कंठ ल पहिचानीस अउ लग गे ओला सांवरे खातिर। इही रद्दा म आगू बाढ़त स्कूल म पहिली बार फ्राक पहिनी ननकी चिरैया हर चल मेरे हाथी ओ मेरे साथी। गाना ल गाइस त बड़े-बडे सुनइया देखया मन के आंखी फाट गीस अउ ऊंखर हाथ के ताली रोके नइ रूकिस। अइसे मजेदार ढंग से सुरू होइस कविता के गीत-संगीत के यात्रा हर।
गीत-संगीत के यात्रा म कविता हर चालीस बछर ले जादा जिनगी बिता दीस हावय। कतको मान सम्मान अउ पुरस्कार वोला ये यात्रा म मिले हे फेर ओखर गायिकी, अउ गरब रहित व्यवहार म कोनो बदलाव नइ आय हावय। जबकि फेर नवा नेवरिया कलाकार चारेच दिन म गरब म परके गोड़ ला भुइंया नइ माड़न दे। ये बारे म कविता के कहना है कि कलाकार के सबले बड़े दुसमन गरब हर होथे। एखर चक्कर म पड़के ‘में हर तो सब जान गे हंव’ के भरम म कलाकार बूड़ जाथें। ये भरम ले दूरिहा मेहर तो गुरुनानक देव के मंत्र ला सही मानथों। उन केहे हवंय कि- नानक नन्हे बने रहो, जैसे नन्ही दूब। बड़ी घास जल जाएगी, दूब खूब की खूब।

छत्तीसगढ़ लोकगीत संगीत ल छत्तीसगढ़ राज बने के बहुत बड़े कारण बतावत कविता जी कहिथे कि कोनो भी राज के पहिचान वहां के संस्कृति हर होथे। हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल बचाय अउ बढ़ाय बर इहां के महिला कलाकार मन के बड़ भागीदारी हावय। जेमा समाज के फिदा बाई, पद्मा बाई, किस्मत बाई के कोनो मुकाबला नइ कर सकें। कतको गरीबी अउ आंधी, पानी के चोट खावत अइसन कलाकार मन छत्तीसगढ़ी लोककला ल अपन खून-पसीना म सींचे हवय। इही मनके लाइन म आज संगीत चौबे, अनुराग ठाकुर, ममता चन्द्राकर, पुष्पलता कौशिक, साधना यादव के नाव ल तको लेना सही होही। ये सब कलाकार मन छत्तीसगढ़ी गीत संगीत खातिर अपन सुख ल भुला के दुख के रद्दा म तको रेंगना पसंद करीन हे। इन कलाकार के सम्मान म सुरता करथों ये दे लाइन ल- कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे में ढल गए कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे में बदल गए।
0 लोककला यात्रा में काखर-काखर खास सहयोग मिलीस?
– दाऊ रामचंद्र देशमुख, दाऊ महासिंह चन्द्राकर, खुमानलाल साव, गिरजा सिन्हा, संतोष टांक अउ मोर जीवन साथी विवेक वासनिक के घलो जबड़ हाथ हावय। ओहर खुद कलाकारी के दुनिया म रात-दिन तंउरत रहिथे।
0 चालीस बछर ले लोकगीत गावत कभू थकासी या उबाऊपन नई लागे ?
-कविता जी कहिथे कि ‘विजय भाई, अपन दाई के जइसन लइका के लगाव रहिथे ओसने मोला लोकगीत संगीत संग हावय। अब तिंही बता महतारी बेटी अलग हो सकत हावय का? मोर प्रान घलो निकलत रिही तभो मैं हर गाहूं- करमा, ददरिया अउ सुआ गीत।’
0 पुराना गायिकी अउ आज के छत्तीसगढ़ी गायिकी में भारी बदलाव आ गे हावय। एकर बारे म ओखर कहना हे कि अब तो छत्तीसगढी ग़ाना सुनबे त अइसे लागथे फिलिम के गाना सुनत हाववों। ‘ए हर सबो गुनोवइया मन बर चिंता-फिकर के बात बन गे हे। अतका बोलत ओ हर एक ठिन लम्बा सांस छोड़िस अउ बोलिस ‘फेर रेलगाड़ी के आय ले बइला गाड़ी के अस्तित्व हर खतम नइ होइस। न कभू खतम होही। अइसनेह हमर लोकगीत-संगीत ला कोनो पछाड़ नई सकय। फेर हां, एकर बर सब पुराना कलाकार मन ला एक संग मिलजुल के नवा कलाकार मन ला सिखाना संवारना पड़ही। हमर संस्था अनुराग धारा मा नवा-नवा कलाकार मन आथें। हमन ओमन ला फिल्मी रंग ढंग ला छोड़ के छत्तीसगढ़ी कला के बारीकी ला अपनाय के सीख दे थन।’
गांव गली अउ खेत खलिहान मां गूंजने वाला लोकगीत अब रेडियो, टेलीविजन, वीडियो सिनेमा में जगा पाके देस बिदेस म बगरत हावय। ऐला देख सुन के कविता जी के कहना हे कि ‘येहू हर समय के फेर आय। गांव के चौपाल ले निकल के हमर छत्तीसगढ़ी गीत संगीत अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मा छागे हावय, लेकिन मोला सुरता हे सन् 1982 में जब मोर गाय गीत ‘पता दे जा रे पता ले जा गाड़ीवाला…’ पहिली बार पॉलीडोर कम्पनी ले रिकार्ड बन के बाजार मा आय रिहिस अउ बीबीसी लंदन के रेडियो में बाजे रहिस त छत्तीसगढ़िया मन के छाती हर बड़े-बड़े सोंहारी कस फूल गे रिहिस। ये गीत हर राइपुर दूरदर्शन केन्द्र के उद्धाटन के बेरा म तको बाजे रहिस।’
अब तो उंडेला पूरा कस छत्तीसगढ़ी गीत के भरमार हो गे हावय। मोला बड़ा दुख लागथे जब नवां नवां गीत ला सुनथों त। काबर कि अइसन गीत मा इतिहास रचे के ताकत नई दिखय। ओमा जनमानस ला बांधे के रस नई मिलय। असल मा पहिले के गीतकार (जइसे नारायण लाल परमार, श्यामलाल चतुर्वेदी, रामेश्वर वैष्णव, मुकुन्द कौशल, लक्ष्मण मस्तूरिया) संगीतकार, गायक, गायिका पसीना के आवत ले मेहनत करें। अंतस ले बूड़ के लिखयं-गावयं-बजावयं। अब तो ये सब हर सपना बरोबर लागथे।
0 छत्तीसगढ़ी राज बने के बाद इहां के कला संस्कृति के दसा दिसा के बारे में कविता के कहना हे कि पथरा बने अहिल्या के जैसे उध्दार होइस तइसने हे छत्तीसगढ़ बने के बाद इहां के कला संस्कृति के उध्दार होगे। अब तो छोटे बड़े सबो कलाकार मन ला दूसर-दूसर राज मा जाके कला देखाय के मौका मिलत हे। गांव-गांव मा लोककला महोत्सव होवत हे। सरकारी खर्चा मा कलाकार मन के इलाज होवत हे। फेर अतेक सुविधा अउ साधन पायके बाद भी पुराना कलाकार मन कस असली कला ला छोड़ के फूहड़ नाच-गाना म नवा कलाकार मन मातें हावयं। ये मन ला मोर इही कहना हे कि मूल से भागे के भूल करके कभू मंजिल तक कोनो नइ पहुंच सकय।
छत्तीसगढ़ लोकसंगीत ला बुलंदी म पहुंचोइया श्रीमती कविता वासनिक जी भारतीय स्टेट बैंक राजनांदगांव म अधिकारी पद म सेवारत हैं। छत्तीसगढ़ी लोकगीत ला छत्तीसगढ़ राज अउ छत्तीसगढ़ के बाहिर राज जइसे हिमालच प्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखण्ड म तको देखाय हावय।

विजय मिश्रा ‘अमित’

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