कुछ तो बनव

आज अंधियारी म बितगे भले,
त अवइया उज्जर कल बनव।
सांगर मोंगर देहें पांव हे,
त कोनो निरबल के बल बनव।
पियासे बर तरिया नी बनव,
त कम से कम नानुक नल बनव।
रूख बने बर छाती नीहे,
त गुरतुर अउ मीठ फल बनव।
अंगरा बरोबर दहकत हे जम्मो,
त ओला शांत करे बर जल बनव।
कपट के केरवस मे रंगे रहे जिनगानी,
त अब तो थोरिक निरमल बनव।
रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

संघरा-मिंझरा

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