संबंध मिठास के नांव ताय मड़ई ह

खेत के सोनहा धान ल जब किसान मन बियारा म काटके लाथे, उहा ले मींज के माई कोठी म लाके रखथे त घर म लक्ष्मी के वास से सबो मनखे मन के हिरदे म एक खुशी झलकत रीथे। उही बीच म थोरकिन मिहनत करैईया सबो मनखे मन ह अपन आप ल ठलहा अऊ काम के बोझ ले उबर गेन कहिके गाँव के पंचाईत म सबो कोही जुरियाथे जेमे मड़ई मनाय के तारिख ल मिरजुर के करार करथे। अईसे कहिबे त हमर छतीसगढ़ के संस्कीरति अऊ परमपरा ल पहिचान देय के नांव आय मड़ई ह। एक ठन खुशी मनाय के परब जेमे बईगा, गाँव के केंवट अऊ राऊत जात के मनखे मन एक चिनहा सरूप डांग बनाथे। जेला मड़ई कीथे, पूजा पाठ करके येमे देवता ल मड़हाथे, फेर ये डांग ल बईगा अऊ केंवट मिलके जेन मेर बजार भराथे तेन मेर राऊत मन ह डांग के चारों कोती नाचत नाचत जाथे। जेला परघना करत हे तको कीथे, आज के समे म मड़ई के सरूप ह भले बदलगेहे, फेर पहिली धरम करम के संगे संग मया के सतरंगी छाँव म रहचुली झूले के नांव आय मड़ई ह। जम्मो सगा सजन के मेल मिलाप इही मड़ई म होवय अऊ अपन सुख दुख ल बाटय अऊ फरियाके गोठ गोठीयावय। जेन गाँव या जगा म मड़ई भरायव वो गाँव म सगा मन के दु चार दिन पहिलीच रेला पेला लगे राहय। सबो जात के मनखे मन अपन अपन सगा के अगोरा तको करय, संबंध में अतका मिठास राहय पहिली, अब के समे म देखे बर नई मिलय। सबो जात के मनखे मन झगरा लड़ई ल गठरी म बांध मड़ई के रंग में रंग जाय, याने मानबे त एक परकार के एकजुटता तको दिखय। पटवा मन के चुरी फूंदरी के दूकान सज जाय माने गाँव के सबो नवा बहुरियाँ मन जईसे ऐकरे करा चुरी पहीनही। झूला, सरकश अजब तमाशा नाचा के पंडाल सज जाय। गोदना गोदैईया करा गोदना गोदाय बर लाईन लग जाय, गन्ना के रस के पागे लाई ऊखरा के ढेरी गंजाय राहय। मड़ई के चमक अईसे बने राहय कि मनखे मन जात पात ल भुला के नाचा गम्मत, सुआ करमा ददriyaरिया के ऐके संग बईठ के मजा लेवय। आज वो मिठास कोनों परब म देखे बर नई मिलत हे। हमर गाँव गाँव के खुशी के परब ह आज अपन सरूप ल खो चुके हे, जेकर जिम्मेदार हमन खुदे हरन अइसे लागथे।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)
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