सिवजी ल पाय के परब महासिवरात्रि

shivaनवा बुता, उद्धाटन, नवा जीनिस के सुरुआत इही दिन ले करथे। भक्ति भाव के अइसन परब में पूजा म अवइया समागरी बेल पत्र, धतूरा, फुंडहर, कनेर, दूध, दही, केसरइया फूल मन के महत्व बाढ़ जाथे। संत पुरुष के गोठ हे के केसरइया फूल ल सिव जी म चढ़ाय ले सोना दान करे के बरोबर फल मिलथे। सिवजी में अभिषेक अउ धारा के तको भारी महत्व बताय गे हे।
सिव माने शुभ अउ शंकर के मतलब कल्याण कइरया होथे। सिवजी के पूजन अराधना अकाल मृत्यु दोष ले छुटकारा देवाथे। पंचाक्षरी मंत्र ‘ऊं नम: शिवाय’ जम्मो कामना ल पूरा करथे। भोले बाबा ल खुश करे बर वोकरे सही बने बर परथे। ‘शिवो भूत्वा शिवम यजेत’ अर्थात सिव बनके सिव के पूजा करे म जल्दी आदिदेव के किरपा मिलथे। सिव के भगत नंगधड़ंग, भगवा उन्हा धारी अउ पैदल चलइया होथे। कूर्म पुरान म पैदल यातरा ल अड़बड़ बढ़िया बताय गे हे। सिव के भक्ति के अर्थ हे सिवत्व में हमा जाना। जम्मो मुलुक म सिवसंकर के भगत मिलथे। काबर कि येकर गिनती जल्दी खुस होवइया देवता म करे जाथे। कोन्हो भी आयु, लिंग, धरम अउ जाति के मनखे मन भगवान आदि देव के पूजा पाठ करके ओकर किरपा पात्र बन सकथे, फेर महासिवरात्रि परब तो तिहार बरोबर आय। बच्छर भर के बाद म ये सुभ बेरा आथे। ये दिन ल अब्बड़ मंगल माने गे हे। नवा बुता, उद्धाटन, नवा जीनिस के सुरुआत इही दिन करथे। भक्ति भाव के अइसन परब में पूजा म अवइया समागरी बेल पत्र, धतूरा, फुंडहर, कनेर, दूध, दही, केसरइया फूल मन के महत्व बाढ़ जाथे। संत पुरुष के गोठ हे के केसरइया फूल ल सिव जी म चढ़ाय ले सोना दान करे के बरोबर फल मिलथे। सिवजी में अभिषेक अउ धारा के तको भारी महत्व बताय गे हे। स्कंद पुरान के अनुसार एक समय के गोठ आय दैत्य दल बड़ेच्च जान सेना धर के देवता ऊपर कूद पड़िस। युध्द म देवता मन हार गें। तब इन्द्र अउ अग्नि देव ल अगुवा बना के ब्रह्म देव करा गिस। वोहा सोज्झे विष्णु के सरण म जाये बर कहिस। ब्रह्मा के संग सबो देवता गिस। गोठ ल सुन के भगवान विष्णु कहिथे- ‘हे देवगण। मेहा तुंहर बल ल बढ़ाहूं जौन गोठ ल गोठियाथवं तेला कान देके सुनव। तूमन ह दैत्य के संघ संघर के जम्मो परकार के औसधि ल लान डरो अउ वोला छीर सागर म डाल दव। ओकर पाछू मंदराचल पर्वत ल मथनी अउ वासुकी नाग के नेती (रस्सी) बनाके मथव, वो में से चौदह ठन जिनीस निकलही, जेन तुंहर काम आही। संग म दु:ख ल कम करही।’ फेर वइसने करे गिस तब चौदह ठन जिनीस- लक्ष्मी, कौस्तुभ, पारिजात, सुरा, धन्वन्तरि, चन्द्रमा, पुष्पक, ऐरावत, पाञ्चजन्य, शंख, रंभा, कामधेनु, उच्चै: क्षवा, अमृत कुंभ अऊ गरल (विष) निकलिस। बाकी जीनिस निकलिस तब एक दूसर ल बांट लिस। फेर गरल निकलिस ताहन देव-दानव दूनों अकबकागे। इही बेरा शिवशंकर अइस अउ जगत कल्याण बर गरल ल गटगट ले पी दिस। बाद अपन घेंच म पचो डारिस। उही बेरा सिव के एक ठन नवा नांव नीलकंठेश्वर महादेव परगे। इही कारण ले वोकर देह घेरी बेरी तपत रथे। अनेक परकार के जुड़ाए जीनिस ले नऊहाय ले ये ताप ले राहत मिलथे। अउ परसन्न होके भगत ऊपर किरपा बरसाथे। धारा अभिसेक म जोन पदार्थ उपयोग म लाय जाथे, ओकर ले अड़बड़ लाभ होथे। पानी ले सर्वसुख सौभाग्य, घी ले वंस विस्तार, दूध अउ शक्कर ले बुध्दि विकास, दूध ले गृह शांति, गंगाजल ले पुत्र प्राप्ति, सरसों तेल ले सत्रुबाधा निवारण, सुगंधित तेल ले भोग प्राप्ति।
पूरा छत्तीसगढ़ ल सिव के गढ़ कबो त कोन्हो किसम के अतिश्योक्ति नई होवय। काबर कि हर कोस, पांच कोस के दूरिया म कोन्हो न कोन्हो जगा सिव पीठ मिल जाथे। कहीं स्वयंभू शिवलिंग हे, त कहूं स्थापित करे गे हे। हमर राज के परयाग राज राजिम म अब्बड़ शिवलिंग हे। जेन हरे कुलेश्वरनाथ महादेव, सोमेश्वरनाथ, गरीबनाथ, भूतेश्वरनाथ, राजराजेश्वर नाथे, दानदानेश्वर नाथ, पंचेश्वर नाथ, पीपलेश्वर नाथ, पद्मेश्वर नाथ, बटुकेश्वरनाथ, पटेश्वरनाथ, बह्मनेश्वर नाथ, चम्पकेश्वर नाथ, फणीकेश्वर नाथ, कर्पूरेश्वर नाथ, औघड़नाथ महादेव आदि। गरियाबंद म भूतेश्वर नाथ सिहावा म कणेश्वर नाथ, शिवरीनारायण म चन्द्रचूड़ महादेव, खरौद म तेरह सौ बच्छर जुन्ना आठवीं शताब्दी के मंदिर के गर्भगृह म एक अद्भुत अउ अनोखा सिवलिंग हे। येमा सवा लाख लिंग हे। किंवदंति हे कि लंका दहन के बाद लक्ष्मण अयोध्या लहूटत रिहिन, तब कुष्ट रोग ले पीड़ित होके गिर गे। उही बेरा सवा लाख सिवलिंग बना के शिवजी के आह्वान करिस तब बने होइस। रतनपुर म वृध्देश्वर नाथ महादेव, रत्नेश्वर नाथ महादेव, भुवनेश्वर नाथ महादेव, सिरपुर म गंधेश्वर नाथ महादेव, बालकेश्वर नाथ महादेव मंदिर, रायपुर म हाटकेश्वर महादेव, भोरमदेव म भोरमदेव महादेव, भिलाई ले तीन कोस ले दूरिया म देवबलौदा म एक ऐतिहासिक शिवमंदिर हे। अइसने अब्बड़ अकन मंदिर म विराजे भगवान सिव के सिवलिंग ह अपन भगत के दु:ख ल दूरिया करते, अकाल मृत्यु दोस ले दूर करे बर शिवजी के महामृत्युंजय मंत्र हे-
‘ऊं त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम।
उर्वारूकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मातृतात्॥’
ये मंत्र के जाप ले अब्बड़ फायदा बताय गेहे। शिवजी ल जम्मो विद्या के जनक माने गेहे। येकर पूजा, स्मरण, जाप, कीर्तन सुख शांति देने वाला हरे।

संतोष कुमार सोनकर ‘मंडल’
चौबेबांधा राजिम

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