कहाँ गँवागे मोर माई कोठी

“पूस के महीना ठूस” कहे जाथे काबर के ये महीना में दिन ह छोटे होथे अउ रात ह बड़े।एहि पूस महीना के पुन्नी म लईका सियान मन ह बड़े बिहनिया ले झोला धर के घर-घर जाथें अउ चिल्ला चिल्ला के कहिथे छेर-छेरा अउ माई कोठी के धान ला हेरते हेरा। घर के मालकिन ला बुलाथें अउ मया दुलार के आसीरबाद ला पाथे।हमर मयारू महतारी मन ह सुपा भर भर के धान ला देके अपन अशीष अउ मया ला बाँटथें।एही दिन हमर लईका जवान संगी मन ह झूम घूम के डंडा नाच म नाचथे फेर कुहकी पार के अपन नाच के गति अउ ताल ला डंडा के संगे संग मिलाके झूमर झूमर के नाच नाच के अपन छेरछेरा ला घर के महतारी दाई मन संग पाके आगू घर नाचे बार चल देथें।गांव के केंवटिन मन के फोरे गजब सुवाद वाले मुर्रा ला खाय के मजा घलाव पाथें।फेर जब ले 1 रुपिया किलो चाउर अउ धान के बोनस मिले ला शुरू होय हावय तब ले हमर किसनहा भाई मन ह सब्बो धान ल सरकारी मंडी म बेच के आ जाथें।खाय बर, बांटे बार अउ इंहां तक बिजहा घलाव बर एको बीजा धान ला संजो के नई राखय,जेखर सेती अब घर घलाव मा माई कोठी ला फोर डारे हावय।अब तो कोठी देखे म कम मिलथे। पहिली सियान मन कहय के कोठी दल त पेट दल।कोठी के धान ला लक्ष्मी दाई मान के ओला रोज दिया देखावन, ओ कोठी ला माथ नवाके ही हमन अउ दूसर काम म बाहिर जावन।कोठी के धान ले ही अमीर अउ गरीब के चिन्हारी होवय।फेर जबले गरीबी रेखा के कार्ड आय हवय तब ले हमर संगवारी मन ह ओ कार्ड बने के सब्बे उधिम ला करथें।जतका उदिम उमन कार्ड बनवाये बर करथें ओतके उदिम अपन अमीर बने बर करतिस अउ घर के माई कोठी ला माथ नवातिस त हमर जिनगी सुधर जातिस।

रामेश्वर गुप्ता

संघरा-मिंझरा

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