ठगही फेर सकरायेत

कहे क्रांति कबिराय, नकल ले झन धोका खाना
कोलिहा मन ह ओढ़े हावंय, छत्तीसगढ़िया बाना।
मीठ-मीठ गोठिया के भाई, मूरुख हमला बनाथे
बासी चटनी हमला देथे, अउ काजू अपन उड़ाथे।
बाहिर म बन शेरखान, बिकट बड़ाई अपन बतावै
भीतर जाके चांटे तलुआ, नांउ जइसे तेल लगावै।
आरएसएस ल कहत रहिस वो, अपन गोसंइया
बदलिस कुरसी बदल गइस, ओकर दादा-भईया।
चतुर बहुत चालक हे, वो सकरायेत ये मोर भाई
छत्तीसगढ़िया भेख बनाके, ठगथे हमर कमाई।
सकरायेत के गाड़ा-गाड़ा बधाई के संग

– तमंचा रैपुरी

संघरा-मिंझरा

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