माटी मोर मितान

सुक्खा भुँइया ल हरियर करथंव, मय भारत के किसान ।
धरती दाई के सेवा करथँव, माटी मोर मितान ।
बड़े बिहनिया बेरा उवत, सुत के मँय ऊठ जाथंव ।
धरती दाई के पंइया पर के, काम बुता में लग जाथंव ।
कतको मेहनत करथों मेंहा, नइ लागे जी थकान ।
धरती दाई के सेवा करथंव, माटी मोर मितान ।
अपन पसीना सींच के मेंहा, खेत में सोना उगाथंव ।
कतको बंजर भूंइया राहे, फसल मँय उपजाथँव ।
मोर उगाये अन्न ल खाके, सीमा में रहिथे जवान ।
धरती दाई के सेवा करथँव , माटी मोर मितान ।
घाम पियास ल सहिके मेंहा, जांगर टोर कमाथँव ।
अपन मेहनत के फसल ल, दुनिया में बगराथँव ।
सबके आसीस मिलथे मोला, कतका करँव बखान ।
धरती दाई के सेवा करथंव, माटी मोर मितान ।
धरती दाई के सेवा करके, अब्बड़ सुख मय पाथंव ।
कोनों परानी भूख झन मरे, सबला मेंहा खवाथंव ।
सबके पालन पोसन करथँव, मेहनत मोर पहिचान ।
धरती दाई के सेवा करथंव, माटी मोर मितान ।

महेन्द्र देवांगन माटी
(शिक्षक)
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला- – कबीरधाम
छत्तीसगढ़
8602407353
mahendradewanganmati@gmail.com

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