नंदाजाही का रे कमरा अउ खुमरी

 

मीर अली मीर जी छग के लोकप्रिय गीतकार आय। उंकर गीत संघरा नंदा जाही का? कमरा अउ खुमरी…। मिलिस। नंदा जाही का… उंकर प्रतिनिधि अउ कालजयी रचना आय। इही गीत ह उंकर संघरा के शीर्षक आय जउन फिट बईठथे। कुल 58 गीत ए संघरा म संग्रहित हवय। जमो गीत ह अपन अलग-अलग रंग म रंग हवय। मीर जी अपने गीत के माध्यम से एक डहर जिहां सामाजिक अव्यवस्था ऊपर बियंग करथे उंहे दूसर डहर अलख जगाय के काम घलो करथे। विगत 10-12 बछर ले गांव-गांव में जाके अपन कर्णप्रिय गीत के माध्यम ले अलख जगाय के जउन काम मीर जी करत हवय वो जम्मो गीत मन ए संघरा म हवय। पढ़े म तो आनन्द आथेच फेर उंकर मुख ले सुने म गीत मन जादा प्रभावी अउ सीधा अंतस म उतरथे। मुहाचाही नाव ले 5 कविता घलो संघरा म संग्रहित हवय।
नंदा जाही का… तो उंकर लोकप्रिय गीत आय जेमा ‘छग के नंदावत संस्कृति’ के सुघ्घर वर्णन हवय-थोकुन देखव, कमरा, खुमरी, अरई-तुतारी, कसेली, गेंड़ी, ढेलवा, लेडग़ा बरी, अदउरी बरी, डुबकी कढ़ी, दंउरी, टेडग़ा चोंगी, टेडग़ा पागी ये जम्मो अब नंदावत जात हे। ये जम्मो जिनिस ल संग्रहालय म संग्रहित करें के जरूरत हवय ताकि अवइया पीढ़ी ल हम बता अउ देखा सकिन। नंदा जाही का… गीत में गीतकार के संवेदना अउ मार्मिकता साफ झलकथे।
मीन जी भ्रूण हतिया के बिरोध म मुखर होके लिखे हवय। भ्रूण हतिया हमर समाज के कोढ़ आय। उन आह्वान करथे कि बेटी धरती के सिंगार हरय, बेटी ल बचावव-
बिना अवतरे कोंख मा झन बुतावय
ककरो बेटी झन गंवावय…
छत्तीसगढिय़ा मन का रहिन अउ अब का होगें, इंकर आर्थिक हालत दिनोंदिन बद ले बदतर होवत जात हे फेर छत्तीसगढिय़ा मन चेतत नइ हे ये बात के पीरा कवि के हिरदे म समा गे हे, उन चेताथे-
चना गहूं के होरा भुंजईया, कजरहा होगेन रे
सेठ साहूकार मालधनी, हम बजरहा होगेन रे…
नशाखोरी उपर करारा बियंग करत नशा के दुष्परिणाम डहर मीर जी अगाह करथें:-
का काहंव संगी कइसे मोकागे
माखुर के झोकरया चेपटी मा बेचागे।
गांव गरीब अउ मेहनती किसान के गुन गावत ओगरे पछीना ला रपोटे के बात मीर जी कहिथें:-
गरूवा के चरईया अऊ ढेलवानी रचईया
ओगरे पछीना ला रपोट लेंतेवे रे…
पूंजीवादी संस्कृति के विरोध म कवि मुखर हो के शोषित वर्ग के प्रतिनिधि बन के कहिथें:-
गठनहा कुसियार बनव रे…
कोन चुहकत हे, देखव हुसियार बनव रे…
सिंगार म भी मीर जी के कलम गजब के चले हावय, नायिका के सुन्दरता के वर्णन अपन गीत म करथें:-
मखना के चानी/ रंग डारे रंगरेजवा रे…
तरपउंरी गोरी-गोरिया/ पईरी मांजथे घठौधा तरिया…
मीर जी गावं, गरीब अउ किसान के गोठ करथे, दबे-कुचले अउ शोषक वर्ग के प्रतिनिधि बन के गीत लिखथे। एक डहर उन साक्षरता के संदेस देथे उंहे दूसर डहर बेटी ल बचाये के बात घलो करथे अगर उनला मैं जनकवि अउ गीकार कईहूं त एमा अतिसयोक्ति नई होही। ए संघरा के कई गीत ल मंच म सुने हंव बड़ प्रभावी होथे अउ सीधा अंतस म उतरथे। गीत के सुरू ले खतम होवत तक श्रोता मन मंत्रमुग्ध होके सुनथे। पुस्तक ह संग्रणीय हवय।
– अजय अमृतांशु
पुस्तक समीक्छा
पुस्तक- नंदा जाही का रे? कमरा अउ खुमरी…
गीतकार- मीर अली मीर
प्रकाशक- वैभव प्रकाशन, रायपुर
मूल्य-100 रुपए मात्र

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2 comments

  • उमाशंकर मिश्र

    बहुत बढ़िया लागिस गा मंजा आगे सिरतोन गउ किरिया

  • Virendra Bahadur Singh

    पुस्तक ह संग्रणीय हवय

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