पितर पाख मा साहित्यिक पुरखा के सुरता : पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय

हाट्स एप ग्रुप साहित्‍यकार में श्रीमती सरला शर्मा अउ अरूण निगम ह पितर पाख मा पुरखा मन के सुरता कड़ी म हमर पुरखा साहित्‍यकार पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय के रचना प्रस्‍तुत करे रहिन हे जेला गुरतुर गोठ के पाठक मन बर सादर प्रस्‍तुत करत हन –

छायावाद के जन्मदाता मुकुट धर पाण्डे ल आखर के अरघ, कालिदास के मेघदूत खण्डकाव्य के छत्तीसगढ़ी अनुवाद …
कैलास परबत के कोर मं हिमगिरि ….कतका सुग्घर …
“हरगिरि के अंचल मं अलका के सोभा हे कइसे ,
पीतम के कोर मं बइठे प्राण पियारी जइसे ।
गंगा के धारा हर जइसे ..।
सरकिस ओकर सारी जान न पावै
भला देख तैं कइसे इच्छाधारी
सतखण्डा ऊपर अलका के बादर हर छ जावै
वर्षा ऋतू मं उमड़ घुमड़ बूंदी के झड़ी लगावै
करिया बादर उज्जर चुंदी अलका दिखथे कइसे
मोती गूंथे हे चुंदी मं कोनो ललना जइसे ….”

बगरे अलक जाल हर होही नयन कोर ला रोके
स्नेह शून्य होही जेहर अब अंजन विरहित होके
मधु सेवन बिन होही जेहर भू विलास बिसराये
ऐसे बाम नयन मृगनयनी के तँय हर जब आये
फरक फरक उठही ऊपर अंग शोभा पाही कैसे
मछरी के डोला में डोलत नील कमल हो जैसे ।।

mukutdhar-pandey

पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय

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