नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी

सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा ? नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी अबड़ मिठाथे रे। फेर हमन नई मानन। संगवारी हो हमर छत्तीसगढ़ राज ला बने 18 बछर हो गे। ए 18 बछर में हमर छत्तीसगढ़ हर बहुत आगू बढ़िस। हमर छत्तीगढ़ में नवा-नवा उद्योग-धंधा खुल गे, नवा-नवा सड़क बनगे, बिजली के उत्पादन में हमन अगुवा गेन, हमर लोक कला अउ संस्कृति घलाव अगुवाइस फेर हमर छत्तीसगढ़ी पकवान हर खुल के हमर छत्तीसगढ़ के बजार म नई आइस ए हर हमर बर अड़बड़ सोचे के बात हरय।
हमन पूस पुन्नी के दिन छेरछेरा तिहार मनाथन। ए दिन हमन अपन कोठी म आए नवा धान के उमंग अउ उछाह के संग पहिली दान करथन तेखर बाद ए धान के उपयोग अपन घर म खाए बर करथन।

जइसे हमर छत्तीसगढ़ के बजार में नवा चाउर उतरथे वइसने घरों-घर चीला अउ पताल के चटनी के दौर शुरू होथे। चीला के बनत ले चुल्हा के तीर म बइठ के आगी तापे के घलाव अलगे आनंद हावै अउ चीला में अतेक भारी गुन हावै के कतको खावव अउ खाएच के मन चलथे। खवइया हर तो कूद-कूद के खाथे फेर बनइया हर बना-बना के असकिटिया जाथे। फेर दूसर दिन घलाव बिहनिया होते साथ चीला के मांग शूरू होय ले पूरा करे बर परबेच करथे काबर के स्वाद के चलते मन नई मानय। हमन जब नान्हे नान्हे रहेन तब हमर महतारी हर कहय। ए चीला बनाए बर बइठबे तहॉ मांग बढ़ते जाथे कभू खतम नई होवय। अतेक मिठाथे चीला अउ पताल के चटनी।
हमर मन म सोंच आथे के काश हमर छत्तीसगढ़ के भाई बहिनी मन डोसा बनाए के जघा म चीला बना के बेचय तब हमू मन ला जघा-जघा चीला के मजा उड़ाय बर मिल जातिस अउ बाहिर ले आए मनखे मन घलाव चीला के महत्तम ला जान लेतिन फेर उमन अपन राज में जा के घलाव चीला के दुकान खोल लेतिन।

अगर हमर सोच हर बजार म उतर जातिस तब कतका अच्छा होतिस। वो दृश्य हर हमर ऑखी म घुमरत हावय के हमर छत्तीसगढ़ में जघा-जघा चीला अउ पताल के चटनी बेचावत हवय अउ जम्मों मनखे मन स्वाद ले के खावत अउ सहिरावत हवय।
अइसे बात नई हे कि नवा चाउर के केवल चीला भर बनथे। फरा अउ पताल के चटनी, तिलगुझिया अउ पताल के चटनी, पीठिया अउ पताल के चटनी, चौसेला अउ पताल के चटनी, चनौरी अउ पताल के चटनी, धुस्का अउ पताल के चटनी…… का पूछना हे फेर। मीठा बनाना हे लो गुलगुला अउ पताल के चटनी फेर एक बात हे कि पताल के चटनी बिना मजा नई आवय। अगर पताल के चटनी नई लेना हे तब अथान अउ नुनचरा ले काम चलाए जा सकथे अउ मजा उड़ाए जा सकथे। तब छत्तीसगढ़ के जम्मों भाई अउ बहिनी मन भिड़ जावव नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी बनाए बर खाए बर अउ खवाय बर। अउ वहू म चिरपोटी पताल के अगर चटनी होगे तब तो अउ का कहना, का पूछना।
गढ कलेवा के नाम से हमर भाई बहिनी मन छत्तीसगढ के पकवान ला बजार म लाए के जउन प्रयास करे हावय वो हर बहुत ही सराहनीय हावय अउ उॅखर हमन ला सम्मान करके छत्तीसगढी पकवान के आनंद लेना चाही।
सियान बिना धियान नई होवय तभे तो उॅखर सीख ला गठिया के धरे म ही भलाई हावय। सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हावय।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता

संघरा-मिंझरा

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