नवा रइपुर मोर रइपुर

हर छत्तीसगढ़ वासी ल अपन प्रदेस उपर गरब करना चाही। काबर के ये प्रदेस ह वोला अइसन गरब करे के भरपूर मउका देथे। ये ह प्रदेस के सांस्कृतिक बल आय जउन वोला अपन मन के बुता करे के अपन मन के बात केहे-बोले अउ लिखे के आजादी देथे। ये सांस्कृतिक ताकत ल हमर प्रदेस के महापुरुस मन हमेसा बढ़ईन। आजो ये काम होवत हे। हमन आज के महापुरुस ल पहिचाने म भले गलती करथन या चिन नइ सकन। ये ह कुछ सुवार्थी मन के चाल आय के उन सुवारथ के धुंधरा ल बढ़ा के सुरुज ल तोपना चाहथे। फेर धुंधरा कभू इस्थाई नइ होवय, वो ह छंटाजाथे। सुरुज ल तोपे के परयास कभू सफल नइ होय।

हमर राज्य ल अस्तित्व म आय बारा बछर हो गे। छे म छट्ठी होथे अउ बारा म बरही। ये अइसन सुघ्धर संजोग आय के छत्तीसगढ़ के बरही म ‘नवा रइपुर‘ अस्तित्व म आगे। ये जम्मों प्रदेसवासी बर सिरतोन बड़ खुसी के बात आय। अब ये मउका आगे हे के राजधानी के नांव ल छत्तीसगढ़ी भासा अउ छत्तीसगढ़िया मन के भावना के अनुरूप रखे जाय जेमा छत्तीसगढ़ियापन झलके। एखर बर राजधानी के नाव ‘नवा रइपुर’ रखे जाना चाही। काबर के छत्तीसगढ़ राज छत्तीसगढ़ी भासा बोलइया मन के क्षेत्र के अधार म बनाय गे हे। हमर मयारू सरकार ह छत्तीसगढ़ी ल प्रदेस के राजभासा बनाय के घोसना कर चुके हे। छत्तीसगढ़ी राजभासा आयोग घलो गठित हो गे हे। छत्तीसगढ़ के जम्मो बड़का साहित्यकार मन अपन छत्तीसगढ़ी रचना म रइपुर के उल्लेख करे हवंय। कोनो कवि के रचना हे जेमा आजादी के पहिली गांधी जी के आह्वान म भारत छोड़ो आंदोलन अउ असहयोग आंदोलन म भाग लेवइया मन रइपुर के जेल म बंद रिहिन तेखर बरनन हवय-

‘‘अरे ‘रइपुर’ के जेल अलबेला रे
जिहां जुरिन गांधी के चेला रे।।‘‘

एक ठी नवा चलागन चले हे के क्षेत्रीय भासा के बात करई ल अलगाववाद कहि के खारिज कर दे जाथे। महतारी भाखा बर मया ह अलगाववाद नो हे। हिन्दी भासा के चिन्ता करइया मन क्षेत्रीय भासा के बात करई ल सांकुर सोंच कहि के खारिज करे म जोर देथे। क्षेत्रीय भासा के विकास म हिन्दी के कोनो नुकसान नइ हे। काबर के हिन्दी तो पूरा देस म बोले अउ समझे जाथे जबकि देस के अधिकतर प्रदेस के अपन-अपन क्षेत्रीय राजभासा अस्तित्व म हवय। उहां उही भासा म पढ़ई-लिखई अउ राजकाज के काम बुता होथे। हमर प्रदेस के मातृभासा छत्तीसगढ़ी आय। छत्तीसगढ़ी ल मान देबो तौ छत्तीसगढ़िया मन के मान बाढ़ही। छत्तीसगढ़िया मन के बढ़ोतरी झन होय कहि के छत्तीसगढ़ी ल हिन्दी बिरोधी बताना महतारी भाखा के बिरोधी अउ बिदेसी भासा अंगरेजी प्रेमी मन के चाल आय। महतारी भासा के हिमायती राज्य के उदाहरन हमर सामने हे। वो जम्मो के गिनती विकसित राज्य म होथे। वोमन अपन महतारी भाखा के माहत्तम बढ़ाय बर जीव-परान दे के भिड़े रहिथे ताकि क्षेत्रीय आम जनता के महत्व बाढ़े। क्षे़त्रीय भासा के परभाव ले प्रदेस अउ शहर के नांव बदले के कई ठी उदाहरन हमर सामने हे। मदरास के नांव तमिलनाडु, उड़ीसा के नांव ओडिसा, बंबई के नांव मुबंई, मद्रास के नांव चेन्नई, कलकत्ता के नांव कोलकाता, बेंगलोर के नांव बेंगलुरु अउ त्रिवेन्द्रम के नांव तिरुअनंतपुरम ल आज पूरा दुनिया ह बदलाव के साथ स्वीकार कर ले हे। दुनिया के कतको देस के नांव भासा के अधार में बदले के उदाहरन ल घलो हम जानथन। छत्तीसगढ़ के महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी ह राजभासा आय। रायपुर ल मूल छत्तीसगढ़िया मन ‘रइपुर‘ कथे अउ जम्मो नामी साहित्यकार मन अपन रचना म रायपुर ल ‘रइपुर’ लिखथंय तौ राजभासा छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया मन के मान बढ़ाय बर राजधानी के नांव ‘नवा रइपुर‘ रखे बर काबर नइ सोंचना चाही? जरूर सोंचना चाही। इहां एक ठी बात धियान देय के लईक हे-अंगरेजी के इस्पेलिंग ल देखहू तौ उहू म Raipur ‘रइपुर‘ ही लिखे जाथे। हमर प्रदेस सरकार ये फैसला करय तौ ये समाचार ह पूरा देस के अखबार के सुर्खी बनही अउ छत्तीसगढ़ी भासा ल संविधान के आठवीं अनुसूची म सामिल करे बर जोरदार दबाव बनही जेखर बर आज ले हील-हवाला होत हवय। अगर इहां के रहवइया आम जनता अउ नेता मन ल छत्तीसगढ़ से प्यार हे तौ अइसन बदलाव बर हिरदे से तइयार होना चाही। हमर प्रदेस के मुखिया मंत्री ह कई पईत अपन छत्तीसगढ़ी परेम ल ओरखा चुके हवंय। अइसे लगथे धुंधरा छंटावत हे अउ हमर प्रदेस के मुखिया ह सुरुज बरोबर अंजोर बगरावत हे। उन हमला मउका दे हे के माथ ऊंच करके सब कोई बोल सकन-

‘‘मोर रइपुर नवा रइपुर’’
जै जोहार जै छत्तीसगढ़।

दिनेस चौहान
मो. 9826778806

लेखक परिचय

Chouhanदिनेश चौहान (दिनेश कुमार ताम्रकार) घरू नाम-राजेन,
आत्मज श्री रामकृष्णा ताम्रकार, माता-श्रीमती अगास बाई ताम्रकार, धर्मपत्नी-श्रीमती वीणा ताम्रकार, संतान-निशान्त चौहान.
शिक्षा- बी.ए., बीटीआई, इंटरमिडिएट ड्राइंग
जन्म- 24.06.1961, भीमसेनी एकादशी, संमत् 2018 धमधा, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़
18 वर्ष की आयु में शासकीय नौकरी में आने के बाद 20 वर्ष की आयु में बधिर विकलांगता का शिकार हो गया। मूलतः चित्रकार, चित्रकारी की कहीं विधिवत औपचारिक शिक्षा नहीं। लेकिन अब गतिविधि मुख्यतः लेखन पर केन्द्रित। हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी में कविता, कहानी, व्यंग्य के अलावा कार्टून एवं चित्र कथाओं का क्षेत्रीय व राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, संकलनों, स्मारिकाओं में नियमित-अनियमित प्रकाशन। आकाशवाणी से कविता का प्रसारण। कार्टून वाच पत्रिका द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय कार्टून प्रतियोगिताओं में लगातार पुरस्कृत। विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित। कई नए एवं पुराने चर्चित कहानीकारों की हिन्दी कहानियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद। स्कूलों में कक्षा पहली से दसवीं तक छत्तीसगढ़ी भाषा का एक विषय के रूप में अध्यापन अनिवार्य किए जाने की पुरजोर वकालत। छत्तीसगढ़ी में पहली बार वर्ग पहेली का निर्माण जो ’पत्रिका’ के ’पहट’ अंक में चौखड़ी जनउला के नाम से धारावाहिक प्रकाशित
विशेष उल्लेखनीय– शासकीय नौकरी में विभागीय वित्तीय एवं अन्य लाभकारी प्रकरणों में बाबू एवं अफसरों को भेंट-पूजा (रिश्वत) की सर्व स्वीकार्य परंपरा है लेकिन मैं सौभाग्यशाली हूं कि रिश्वत विहीन नौकरी के 33वें वर्ष में सफलता पूर्वक कार्यरत हूं। मैंने कलम को हथियार बनाकर एक तरीका विकसित किया है कि मेरे अब तक के सभी वित्तीय एवं लाभकारी प्रकरण बिना किसी आर्थिक लेन-देन के निराकृत होते रहे हैं।
प्रकाशित कृति– कइसे होही छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया?(छत्तीसगढ़ी गद्य संग्रह)
प्रकाशनाधीन- 1.चौखड़ी जनउला(छत्तीसगढ़ी वर्ग पहेली), 2.सृजन साक्षी (हैहयवंशीय क्षत्रिय ताम्रकार समाज के रचनाधर्मियों की पहचान)
संप्रति- छत्तीसगढ़ शासन, शिक्षा विभाग में उच्च वर्ग शिक्षक के पद पर कार्यरत
संपर्क- छत्तीसगढ़ी ठिहा-
सितला पारा, नवापारा-राजिम,
जिला-रायपुर, छ.ग. 493881
मो. न.-9826778806.

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