पितर पाख : पितर अउ कउँवा

कउँवा के नाँव सुनत एक अइसे चिरई के रुप दिखथे,जेकर रंग बिरबिट करिया, एक आँखी फूटहा माने अपसकुनी, बोली मा टेचरहा, मीठ बोली ला जानय नहीं ,खाय बर ललचहा, झगरहा, कुल मिलाके काम , क्रोध, लोभ मोह, ईर्ष्या, तृष्णा के समिल्हा रुप।सब चिरई मन ले अलग रहइया।अपन चारा ला बाँट के नइ खावय।
अइसे तो कउँवा के महिमा हा सबो जुग मा हावय।सतजुग मा भगवान शंकर हा सबले पहिली राम कथा ला पार्बती ला सुनाईस।वो कथा ला पेड़ मा उपर बइठे ये कउँवा चिरई हा सुन डारिस।शंकर के असीस से पाछू कागभुसुंड नाँव ले जनम धरिन।अऊ सब ला राम कथा सुनावय-

उमा कहिउँ सब कथा सुहाई।जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।।

एक कथा आथे त्रेता जुग मा जब बनवास बखत राम सीता पंचवटी मा रहत रहिन। एक दिन सीता जी के फूल से सिंगार करिन । ओकर रुप ला देख के इंद्र के बेटा जयंत कउँवा सवाँग (रुप) धरके सीता माता के पाँव ला ठोनक दिस।राम गुस्सा होइस पाछू इंद्र के माफी माँगे ले राम जी हा जयंत के एक आँखी ला फोर दिस।तेकर सेती आज घलो कहे जाथे कि कउँवा एक आँखी ले देखथे।मानस मा तुलसीदास जी लिखे हवय-

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा ।।

सीता चरण चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारण कागा ।।

चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना ।।
रामचरित मानस मा उत्तरकाण्ड मा काग काकभुसुंड जी के बहुत महिमा बताय हवय। जौन निरन्तर राम नाम के कथा कहिथे अउ सब जीवमन सुनथे।दुवापर जुग मा नानकुन कन्हैया के हाथ ले घीव चुपराय रोटी ला नँगा के लेगे रहिस। कन्हैया के पाछू पाछू रोटी माँगत दउड़े के प्रसंग भागवत मा आय हे।अइसने कवि रसखान अपन हिरदे के भाव ला घलाव लिखे हवय-
काग के भाग बड़े सजनी,
हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी।
कहे जाथय कउँवा हा शनिदेव के सवारी आय।शनिदेव के सवारी होय के सेती ओकर कुछ गुण कउँवा मा घलो आ गय हवय।जइसे शनि ला बने नइ कहे जाय वइसने कउँवा ला बने नइ कहे जाय। कउँवा के नजर हा ठीक नइ रहय।घर भीतर ले खाय के जिनिस मा चोंच मार देथय।
दूसर ए कहे जाथय कि जइसे मनखे मन परेवा (कबूतर) चिरई ला अपन संदेशिया बनाय हवय वइसने गरुड़ पुरान मा लिखाय हवय कि कउँवा ला यमराज के संदेशिया कहे जाथय।कइथँय कि यमराज हा साल मा 15 दिन बर सब जीव ला सुतंत्र करथे तब सब पितर मन कउँवा बनके मिरतुलोक मा आथँय अउ सगा संबंधी,अपन बेटा बहू नाती पंथी ला मिलथे, खुश देखके उकर हिरदे जुड़ा जथे।पितर मन देवता बरोबर परभावसाली होथे।वो मन जतका जादा खुश होथय ओतके जादा असीस देथय।फेर नराज घलाव जल्दी होथय अउ शराप के चल देथँय।पितर पाख मा कउँवा ला खवाय मेवा मिठई हा पितर मन ला मिलथे।
पितर पाख मा ब्राम्हन भोज के परंपरा घलाव हवय।एकर से जीव के मुक्ति होथय।कउँवा हा पहिली ब्राम्हन रहिस।ऋषि के शराप ले कउँवा बनगे।राम चरित मानस मा एकर प्रसंग आय हवय।यहू एकठन कारण आवय कि कउँवा ला पितर पाख मा खवाय पियाय जथे।फेर आजकाल कउँवा मन पितर पाख मा घलो नइ दिखय। जुन्ना सियान मन कहय कि बिहनिया ले जेकर छानी मा कउँवा काँव काँव करही समझव कि ओकर घर मा सगा (मेहमान) जरुर आही।अब तो कतको ला छानी नसीब नइ होय।सहर मा दुमंजिला तिमंजिला मा किराया के घर मा रहिबे तब कहाँ ले कउँवा आही। बिज्ञानिक मन कहिथँय कि नानम् किसम के तरंग के सेती छोटे जीव , चिरई चिरगुन के नास होवत हे।कीटनाशक दवई मन कीरा ला मारथे पाछू उही ला कउँवा खाथे तब ओकर मरना तय हे।हो सकत हे ये बात सच होही । फेर यहू मा एक सच्चई है कि आज पढ़े लिखे बहू बेटा मन अपन पितर के उपर जाय के बेरा मा सेवा, देखरेख नई करय। कतको झन तो वृद्धाश्रम मा छोड़े रहिथे, मरे पाछू ले दे के किरिया करम ला करके छुट्टी पाय रहिथे। एती बेटा बहू अपन छोटे परिवार मा खुश हावन कहिके भरम मा जीथँय।अउ ये सब परंपरा ला ढकोसला कहिथँय।
आज घर मा दुख,धन के कमी,करजा मा लदाय रहे अउ नान नान बिमारी मा परे रहे के काय कारण आय ? थोकिन गुनान करन। हमर घर कउँवा काबर नइ आय ? हमर पितर मन काबर नइ आय ? आज पितर मन के असीस हमला मिलत नइ हे । दुखी होके,पीरा खावत उपर जाय के पाछू दुबारा खाल्हे आय बर उँखरो जीव नइ करय। मनखे कतको पढ़ लय , गुन लय फेर जौन अपन संस्कृति परंपरा ला छोड़ देथय वोहा कभू सुख मा नइ जी सकय।जवानी के रहत ले नइ मानय, जब उमर 45-50 होथे ताहन इही परंपरा हा ओला बने लागथे,अउ पितर तिहार माने बर अरोस परोस ला बला बला के हर बच्छर किसम किसम के रोटी पीठा खवाथे जेला अपन दाई ददा पितर ला कभू खवाय नइ रहिस।फेर अब तो देर होगे हवय , कतको उदिम करले तोर घर कउँवा कभू नइ आय।तँय कतको गोहार कर-कउँवा बनके आबे पितर मोर घर!

हीरालाल साहू”समय”
छुरा,जिला-गरियाबंद

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