राजा तरिया

भोलापुर गांव के जमीन न तो सरलग अउ सोझहा हे,अउ न चिक्कन-चांदर हे। खोधरा-डिपरा ले पटाय हे, बारा मरोड़ के भूल-भुलइया हे। मंदिर ह डोंगरी के टिप म बने हे त जइत खाम ह खाल्हे तला म। ऊपर डहर ऊपर पारा, खाल्हे कोती खाल्हे पारा अउ बीच म मंझोत पारा। खाल्हे पारा वाले मन बर ऊपर डहर मूंड़ी उचा के देखना तको अपराध रहय,चढ़े के तो बातेच मत सोंच। फेर सारकारी नियम कानून अउ बदलत जमाना के असर के कारण अब बड़े-बड़े खोधरा-डिपरा मन पटावत आ गे हे। ऊच-नींच के अंतर घला अब कम हो गे हे। ये तो होइस खाल्हे अउ ऊपर वाले मन के गोठ। मंझोत वाले मन के दसा सब ले जादा खराब हे। ये मन खाल्हे कोती देख के अपन आप ल ऊपर वाला समझथें, तब ऊपर वाले मन कहिथें, -’’तुम साला सब नींचा।’’
राजा मन के राज खतम होय म अभी टेम लगही। अभी खाली नाम बदले हे, राज उंखरेच चलत हे। पहिली के मन राजा, मुकड़दम अउ गंउटिया कहलावंय, अब मंत्री, संत्री अउ नेता कहलावत हें। ऊपर पारा अउ खाल्हे पारा वाला मन कतको सरकारी नउकरी लग के अपन बनवती बना लिन। कतरो साहब बन गें, कतरो डाक्टर बन गें, कतरो मन मास्टर अउ बाबू बन गिन। ऊपर पारा वाला मन नेतागिरी म घला आगू हें। झाड़ू गंउटिया कहत लगे, रायपुर दिल्ली सिवा कोई बातेच नइ करय। मरे बिहान हे मंझोत पारा वाला मन के। थोरिक बहुत मास्टर मुंसी वहू मन बन गे हें, फेर जादा मन पढ़ लिख के बेकार हो गे हें। कथे न, धोबी के कुत्ता घर के न घाट के। न सरकारी नउकरी मिलिस, न खेती-खार म मन लगिस। दाइ-ददा के कमइ ल दिन भर पान-गुटखा खा के थूंकत रहिथें। कुकुर मन सरिख लुहुंग-लुहुंग नेता मन के पीछू-पीछू लुटलुटावत रहिथें। दाई-ददा के मान करंय चाहे मत करंय, इंखर मन के तलवा चांटत रहिथें। जब दाई-ददा के इज्जत नइ करंय, तब दूसर के का करहीं।
पहिली के लइका मन के बाते दूसर रहय। बड़े-बुजरुग मन ल आवत देख के बेरेंच-कुरसी ले उठ जातिन। आघू म पान-सुपारी ल घला नइ खातिन। गांव भर ल परिवार कस मानतिन। कका-बबा, गंगाजल-महापरसाद के नता म नेताय रहितिन। जमाना बदल गे। न पढ़इ-लिखइ म चेत, न खेती-बारी म धियान। मरजाद ल जइसे खंूटी म टांग देय हें, कुछू कहे म सोझ रगड़थें -’’अरे चल, अपन जघा म खेल। जादा झन उचक। अपन बेटा-बेटी ल पहिली संभाल।’’
नाता गोता के जम्मो मिठास ह सिरा गे हे।
भोलापुर गांव घला देस के दूसर गांव मन सरीखेच हे। गांव के अमरतिच म संघरा दू ठन बड़े-बड़े तरिया हे। तरिया मन के मंझोत म एक-एक ठन पक्का चंवरा बने हें। सियान मन बताथें कि पहिली ये चंवरा मन के ऊंचाई अच्छा लाम लहकर आदमी के टीप छुअउल रहय। अब तो लद्दी पटइ के मारे तरिया मन ह खेत बन गे हंे। चंवरा मन माड़ी माड़ी भर हो गे हें। चंवरा मन के बीचों बीच सइघो पेंड़उरा बरोबर, चिक्कन-चिक्कन छोलल खंबा गडे रहय। दुनों तरिया मन के, अउ ये खंबा मन के घला अपन कहानी हे। अतराब के चार-चार कोस तक इंखर कहानी परसिध्द रिहिस। गांव के बुजरुग सियान मन आजो ये कहानी ल बताथें। लोग लइका मन भले अइसन बात ल आलतू-फालतू समझ के रेंग देथें, फेर सियान मन गजब गरब-गुमान के संग ये बात ल बताथें।
तइहा के बात आय। देस म सुक्खा अंकाल पड़े रहय। खेत के धान ह पिकिया-पिकिया के भुंजा गे। त्राहि-त्राहि मच गे। भूख-पियास म आदमी मरे लगिन। उही बछर जनता ल पोंसे खातिर राजा ह ये तरिया मन ल खनवाय रिहिस। दूसर साल भगवान के किरपा होइस। झमाझम पानी गिरिस। सोला आना खेती होइस। तरिया मन घला लिबलिब ले भर गें। फेर अलकरहा हो गे। एती चउमास बीतिस, ओती तरिया ठकठक ले। समुंदर सरिख तरिया, पानी कइसे सुखइस, कहां गिस, कोनों गम नइ पाइन। दूसर साल घला अइसनेच होइस। आगू साल घला इहिच उपद्रव।
गांव के सियान मन बिचार करिन। आखिर तरिया मन म पानी काबर नइ थिराय? देखा-सुनी करिन। बाम्हन-पंडित मेर पोथी-पंचांग देखाइन। गांवेच म, पेटला महराज के पुरखा मन म एक झन महराज अबड़ ज्ञानी रहय। पटृटी कलम धर के तरिया मन के कुंडली बनाइस। घंटा दू घंटा ले गिरह-नछत्तर के चाल अउ दसा देखिस। बने बिचार कर लिस, जांच-परख लिस तब बताइस – ‘‘जजमान मन मोर बात ल बने धियान दे के सुनिहव। दुनों तरिया मन के बिहाव जब तक नइ होही, पानी कभू नइ मांड़य। वइसे भी सास्त्र के अनुसार बिना बिहाव करे तरिया के पानी से निस्तार नइ करना चहिये।’’
सियान मन महराज के खूबेच इज्जत करंय। वहू मन ल बात जंच गे। किहिन – ‘‘ये काम ल तुंहर सिवा अउ कोन कर सकही देंवता। काम ल कब करना हे, कइसे करना हे, तुfहंच मन जानव। बड़ किरपा होतिस।’’
धरम के काम समझ के महराज घला एके भाखा म तइयार हो गे। किहिस – ‘‘संकर भगवान ह आसिरवाद अउ बरदान देय हे कि बर-बिहाव खातिर अकती के दिन ले जादा सुभ अउ कोनों दिन ह नइ होवय। विही दिन बर सबो तियारी कर डारव।
अतराब म बात बगर गे। अकती के दिन भोलापुर म तरिया मन के बिहाव होने वाला हे।
गांव गांव नेवता पठोय गिस। अकती के दिन भोलापुर म हजारों आदमी सकला गें। बजनिया मन दमउ, दफड़ा, मोहरी धर के आइन। अखाड़ा पारटी वाले मन अखाड़ा धर के आ गें। गांव सइमो सइमो करे लगिस।
आधा गांव बेटी वाले बन गें। आधा गांव दुल्हा पक्ष वाले बन गें। बेटी वाले मन अपन तरिया के लद्दी ल निकालिन। बेटा वाले मन अपन तरिया के लद्दी ल निकालिन। जम्मों डहर साफ-सफाई करिन। लीप-बहर के मड़वा छाइन। आन गांव के देखइया मन बरतिया बन गें।
बड़ धूम धाम ले बरात निकलिस। बाजा-गाजा के धूम हो गे। कलाकार मन घोड़ा-हाथी के स्वांग धरे रहंय। जोक्कर-परी मन के नाच अलग चलत रहय। मोटियारी मन बिधुन हो के, खांद जोरे-जोरे जोत्था के जोत्था भड़ोनी गाय म भिड़े रहंय। गोधूलि बेला म बिहाव संपन्न हो गे। इही बिहाव के निसानी आय वो खंबा मन।
चौमास आइस। झमाझम बरसा होइस। दुनों तरिया मन लिबलिब ले भर गें। चौमास बीतिस। पानी जस के तस। काजर सरिख निरमल जल लहर-लहर लहराय लगिस।
तरिया के पार मन म चारों मुड़ा बर, पीपर अउ आमा के बिरवां लगाय गिस। गांव के सोभा अउ पहिचान, बर-पीपर के पेंड़ अउ आमा के बगीचा ले होथे।
ये बात कोन जाने कते जुग के होही ते। बिहाव के खंबा मन अब सर-घुन के नंदा गे हे। बोरिंग के जमाना म तरिया के कोन पुछंता हे? लद्दी म तरिया पटा गे। चौमास नंहके के बाद लइका मन इंहचे किरकेट खेलथें।
छत्तीसगढ़ राज बनिस। सरकार अब इही तरिया मन ल बोfरंग के पानी ले भरे के उदिम करथे।

कुबेर
(कहानी संग्रह भोलापुर के कहानी से)

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