सरगुजिहा जाड़ा कर गीत

जाड़ा कर मारे, कांपत हवे चोला
बदरी आऊ पानी हर बईरी लागे मोला।

गरु कोठारे बैला नरियात है,
दूरा में बईठ के कुकुर भुंकात हवे,
आगी तपात हवे गली गली टोला,
जाड़ा कर मारे………

पानी धीपाए के आज मै नहाएन
चूल्हा में जोराए के बियारी बनाएन
आज सकूल नई जाओ कहत हवे भोला
जाड़ा कर मारे……

बाबू हर कहत हवे भजिया खाहूं
नोनी कहत है छेरी नई चराहूं
संगवारी कहां जात हवे धरीस हवे झोला,
जाड़ा कर मारे………….

मधु गुप्ता “महक”

संघरा-मिंझरा

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