सेल्फी ह घर परवार समाज ल बिलहोरत हाबय

समे बदल गेहे जमाना कती ले कती भागत हे तेकर ठिकाना नईये, जमाना सन पल्ला भगैईया हमर मन के मगज ह कोन चिखला दांदर म बोजा गेहे, सबो के मति अऊ सोचों ह सेल्फी सन रहीके सेल्फीस होगे हे। सुघ्घर दिखे के चक्कर में हमन भुला जथन कोन करा गढ्ढा हे, कतीहा पखरा हे, कती के रद्दा म काँटा बगरे हे सेल्फीस बनके एक धर्रा म रेंगत हन। थोरको झमेला ल ककरो नई सेहे सकन, अकेल्ला के खुशी बर घर परवार ल मजधार में छोड़ के सेल्फी सन रेंग देथन। बड़ चिन्ता होथे ये सेल्फी ह जब ले आय हे, सबो मनखे के चैन ल छीन लेहे, जम्मों झिन के मुँह ह टेड़गा होगे हे। सोजे मुँह कोनों बाते नी करय। ये बीमारी मोरे घर के बात नोहय कोन बड़का कोन गरीबहा सबो घर देहगिरी असन पलथियाय बईठे हे। जईसने बेटा के बाप सन नी जमय, भाई सन भाई के तारी नीं पटय, ननद भौजई के पटरी नीं मिलय, सास बहु के रोजे रोज महभारत, काला गोठीयाबे सबो मनखे सेल्फीस बन गेहे। अकेल्ला पहार ल फोड़ डारबो कीथे फेर पहार तो पहार अपनेच गोड़ ल दनगरा ले नीं निकाल सकय।




पहिली जमाना अऊ पहिली के मनखे मन बने रिहीस हे, सबो कोही मिरजुर के कमावय खावय बड़े बड़े पहार जईसने बिपत ल हाँसत हाँसत निपटावय। खुशी म अईसे खुशी मनावय कि कोनों बड़का परब असन लागय फेर उहूँ जमाना में फूटो खीचे के मिशीन रिहीस हे। सुघ्घर सबो परवार बईठ के ऐके साथ फूटो खीचवावय अऊ फरेम म बंधवा के घर के देहरी नईते परछी में टागें राहय। सबो काम सुनता सलाह अऊ सुमत में चलत राहय, अब तो कोन अंधरा मन के नजर लगगे, अईसे सबके मति ल मार दिच जेला देखबे तेन ह सेल्फी के पीछू म भागत हे। लईका लागत हे, न सियान, जानत हे ये सेल्फी ह सबो झिन के चेहरा म धुर्रा पोत के सेल्फीस बनावत हे। तभो ले जीव ल जोखिम में डारके, बने सहराही कहीके अकेल्ला अकेल्ला सेल्फी खीचत हे। मेंहा मानथव परसथिति के हिसाब से ढले में समझदारी हे, पर अईसना ढलई ह तो नासमझी अऊ गंवारी लगथे। हमन कीथन शहर में जादा सेल्फीस रईथे मनखे मन, फेर गाँवों ह सेल्फी के मार ले नई बच पाय हे ।




शहरिया के बड़े भाई बनगे हे गंवैईहाँ मन, कोनों ककरो नीं सुनय मनखे के गोठ ल मनखे नई गुनय। सुखावत हाबे बड़का रूख राई ह, डारा पाना सेल्फि होगे, ढूड़गा देखत रोवत हे ओकर दुख पीरा आँसू पोछैईया कोनों नीये। ढूड़गा तरी कांदी कचरा लद्दी बजबजावत हे, कांदी कचरा म सेल्फी लेके आज के मनखे अतेक इतरावत हे जेकर कोनों सीमा नींये। सेल्फी के बिख ह नस नस म अईसे फ़ैईल के पाँव पसार डरे हे कि हमन ओकर पीछू भागके घर परवार समाज देश के समस्या ल भुला डरेहन। कईसे बनही समाज ह समरिध, परवार ह खुशहाल वोला सोचे बर पड़ही, अऊ अब नई संभलबो त भोगे बर पड़ही। सेल्फी के बिसफोट अतेक भयानक हाबे, फूट जही एकात दिन बम बनके तव सहीच म मुंहू कान टेड़गा बेड़गा हो जही। ये सेल्फी ह सबो कोही ल बिलहोरत हे, हमन सेल्फी के धारे धार म सेल्फीस बनके बोहावत हाबन अऊ गरी के फोही असन उफल के उबुक चुबुक काया ल देख सहरावत हाबन।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)
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