नंदावत हे रूख-राई : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन बने-बने स्वादिश्ट फल के बीजा ला जतन के धरे राहय। उॅखर पेटी या संदूक ला खोले ले रिकिम-रिकिम के बीजा मिल जावत रहिस हे। जब हमन छोटे-छोटे रहेन तब हमर दाई-बबा के संदूक ले कागज के पुड़िया में रखे कोहड़ा, रखिया, तुमा, छीताफल अउ कई परकार के बीजा मिल जावत रहिस हे। देख के बड़ अचरज होवय के दाई-बबा मन बीजा ला अतेक सम्हाल के काबर धरे हावय। पूछन तब बतावय। कहय-बेटी! जब पानी गिरही ना तब एला बो देबो। बने-बने बीजा मन ला सम्हाल के रखना चाही। उॅखर रूख-राई के प्रति समर्पण अतका राहय के जब बर-बिहाव के सीजन आवय तब उमन रूख-राई के घलाव बिहाव करै। हमर बबा के जब बिहाव होइस तब घर ले अड़बड़ दुरिहा में आन कोनो के ब्यारा में हमर आजा बबा के हाॅथ के लगाए आमा के रूख के बिहाव करे गै रहिस हावय। पाछू फेर एक ठन नियम आइस के जेखर जमीन रही रूख हर ओखरे कहे जाही। तभो ले वो ब्यारा वाले हर टुकना भर आमा हर साल हमर घर मा अमरा देवत रहिस हावय।




नान्हे राहन तब हर साल आमा बगइचा घूमे बर जावन अउ अपन आखी के सामने रखवार करा आमा तोड़वा के टुकना-टुकना आमा घर लावत रहेन अउ अचार बनवावत रहेन। हमर महतारी हर पहली फर आय कहिके पारा-मुहल्ला के जम्मों घर में पहली बांट लय तेखर पाछू अपन उपयोग में लावय। तइहा के सियान मन के बगइचा राहय। हमर घर ले अड़बड़ दुरिहा में हमर छीता बगइचा घलाव रहिस हावय। जब तक हमर दाई-बबा रहिस हावय तब तक ओखर देख-रेख होइस ओखर बाद जम्मों रूख-राई मन रखवार के होगे। नौकरी-चाकरी में बाहिर निकरे के बाद कोनो ला बगइचा डाहर जायके फुरसत नई मिलिस अउ जरूरत घलाव महसूस नई होइस। तइहा के मनखे मन रूख-राई ला अपन घर के सदस्य बरोबर मान देवय। अब तो कई ठन रूख-राई के पते नई चलय। जब हमन छोटे-छोटे राहन तब दोना में शहतूत बेचावय तेला भूसा कीरा आय कहिके डेरावन फेर ओखर स्वाद ला पाए के बाद आज तक नई भुला पाएन फेर हमर लइकन मन तो शहतूत का होथे तेला जानय घलाव नही। तेंदू, चार मन तो अब अमरा मोल पिपरा जरी हो गे हावय।




रामफल अब तो कभू-कभू देखे बर अउ खाय बर मिलथे। अब मन में विचार आथे कि हमन काबर इंखर बीजा ला सहेज के नई्र धरेन। कमरस के फल अब नोहर होगे। आलू बुखारा घलाव बजार में कम देखे बर मिलथे। किन्नी, फालसा, कोइया, मकोइया, डूमर, कदम, बनबोइर, गंगा अमली, कैथा श्री आवला, चिरइजाम ए जम्मों फल में कखरो तो दरसने नई होवय त कखरो बहुत कम दरसन होथे। आनी-बानी के इंजेक्शन वाले फल-फूल तो बजार में अड़बड़ मिलथे जइसे बिना बीजा वाले अंगूर, पपीता, फेर हमर देसी फल-फूल मन कहां चल दिस तेखर पता हमनला लगाए बर परही। जइसे हमरे गांव, हमरे घर, हमरे देस ला सफा राखे बर सफाई अभियान चलाए बर परत हे वइसने का रूख-राई के प्रजाती ला बचाए बर घलाव हमनला कोनो अभियान चलाए के जरूरत हावय के नही यहू हर हमर बर अड़बड़ सोचे के बात हरै। सियान बिना धियान नई होवय। तभे तो उॅखर सीख ला गठिया के धरे मा ही भलाई हावै। सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हावै।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता



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