सुरता (संस्मरण) – सिकरनिन दाई

जब मंय ह प्रायमरी कक्षा म पढ़त रेहेंव अउ हमर ददा-कका मन के संयुक्त परिवार रिहिस त परिवार म बारो महीना कोई न कोई घुमंतू मंगइया-खवइया नइ ते पौनी-पसेरी मन के आना-जाना लगेच् रहय। विहीमन म एक झन माई घला आवय। हमर दाई-काकी, परिवार के अउ गाँव के दूसरमन ह वोला सिकरनिन कहंय। मंय ह वोला सिकरनिन दाई कहंव।
सिकरनिन दाई ह होली-देवारी अउ दूसर तिहार-बार होतिस तभे आतिस। आतिस तब भीतर आंगन म आ के एक ठन आंट म बइठ जातिस। जब कभी वो आतिस, इहिच आंट म बइठतिस। सेरसीधा झोंके बर वोकर तीर एक ठन टुकना रहितिस। एक-दू ठन झोला घला रहितिस। गाँव के दूसर घर घला वो ह जावय। वो ह मोला गजब मया करे, बिलकुल दाई बरोबर। मोर मन करे कि वोकर गोद म जाके बइठ जातेंव। फेर अइसन कभू नइ हो सकिस। सिकरनिन दाई ह घला मोला अपन गोद म बइठारे के कभू कोशिश नइ करिस। वो ह दुरिहाच् ले बात करतिस। मिलनेवाला सेरसीधा ल घला दूरिहाच् ले झोंकतिस। आशा के अनुसार सेरसीधा नइ मिलतिस कि कोनों अउ चीज के जरूरत होतिस ते मुँह फटकार के मांग लेतिस। सब संग बढ़िया प्रेम से सुख-दुख के बात गोठियातिस। सेरसीधा पा के गजब आसीस देतिस अउ दूसर दुवारी चल देतिस।
अलग बइठना अउ दुरिहा ले गोठियाना, दूरिहा ले सेरसीधा झोंकना हमर समाज के जाति व्यवस्था के नियम हरे, ये बात ल मंय ह लइकापन म का जानतेंव? मंय ह येला सेरसीधा मंगइयामन के नियम होही समझंव।
जब ले मोर उमर ह जाने-सूने के होइस तब ले मंय ह वोकर अवई अउ वोला जानत रेहेंव। अउ जब मंय ह कालेज म गेयेंव तब तक वोकर आना जारी रिहिस। बाद म वोकर आना बंद हो गे। काबर? का बतावंव। बात वोकर सियानमन सरीख लगय फेर उमर म वो ह कभू मोला सियान असन नइ लगिस। वोकर उमर के बारे म का बतावंव। दाई ह लइका बर उमर भर दाईच् रहिथे। न कभू जवान, न कभू सियान। या तो वो ह चले-फिरे म असक्त हो गिस होही या फिर वोकर इंतकाल हो गिस होही। नइ ते आयेबर वो ह काबर छोड़तिस?
मोर जानेसुने के उमर होय के पहिली वो ह आवत रिहिस होही कि नइ आवत रिहिस होही, का जानव? आवत रिहिस होही त का वो ह कभू मोला अपन गोद म बइठारत रिहिस होही? बइठार के मोला दुलार करत रिहिस होही? का पता? फेर अब, जब मंय ह हमर समाज के जाति व्यवस्था अउ छुआछूत के व्यवस्था ल समझ गे हंव, मोला नइ लागय कि वो ह अइसन कर पावत रिहिस होही।
वो ह शिकारी जात के रिहिस। पंड़की, बटेर अउ तीतर जइसन चिरई अउ मुसुवा, खेखर्री जइसन छोटे-मोटे जन्तु के शिकार करना; बबूल, लीम अउ करंज के दतवन टोरना अउ वोला बाजार म बेचना इंकर पुश्तैनी धंधा आय। शिकार करे बर उँकर तीर तांत अउ बांस के कमची के बनाय फांदा रहय, जउन ल वोमन खुदे बनावंय।
दूसर जातवाला कोनों आदमी वइसन फांदा नइ बना सकंय। बबूल, लीम अउ करंज के दतवन बने के लाइक पतला-पतला टहनी कांटे बर वोमन सइघो बांस के पतला छोर कोती धारवाला बिना बेठ के हँसिया बांध के बनावल अकोसी धर के आवंय। जमीन म खड़े-खड़े वोमन अकोसी म कतको अकन दतवन कांड़ी कांट लेतिन। अइसन ढंग ले कांटे दतवन कांड़ीमन के कांटा अउ पत्ता-डारामन ल छांटेबर वोमन तीर बंकी रहय।
फांदा, अकोसी अउ बंकिच् ल ऊँकर स्थायी संपत्ति जान। खेत-खार, जमीन-जायदाद जइसे स्थायी संपत्ति भला ऊँकर तीर कहाँ। अब शिकारीमन मेहनत-मजदूरी के कोनों दूसर काम करे लग गिन होहीं। वोमन के लोग-लइकामन पढ़लिख के सरकारी नौकरी पा गिन होहीं अउ अपन जिनगी ल सुधार लिन होहीं। अपन अइसन पुश्तैनी काम ल छोड़ दिन होहीं। विही पाय के अपन काम-धंधा खातिर वोमन के गाँव कोती अवइ अब कम हो गे हे। आज के दिन चिरई-चिरगुन के शिकार करना संभव नइ हे। ये जीवमन अब दिखथेंच कहाँ? कानून के बंदिश अलग हे। ये काम अब वोमन नइ करंय। फेर दतवन टोरे अउ बेचे के काम आजो विहिचमन करथें।
ये हर चैहत्तर-पचहत्तर के पहिली के बात आवय। फेर आजो सिकरनिन दाई के धुँधरहू छबि ह मोर आँखी आगू बनथे। वो ह बनेच् ऊँचपुर रिहिस। शरीर ले पतला-दुबला। बनिहार ले घला गयेबीते उँकर जिनगी रिहिस होही। वइसन भोजन वोमन ल कहाँ मिलत रिहिस होही कि वोमन के शरीर म चर्बी जमा हो पातिस? कि शरीर ह पानीदार दिख पातिस? वोकर शरीर म पानी भले नइ रिहिस होही पन मोला बिसवास हे कि वोकर स्वभाव म पानी के कोनों कमी नइ रिहिस होही। हँसी-मजाक ह अपन जघा हे, इज्जत अउ मान-सनमान ह अपन जघा। नइ ते अपन इज्जत बचाय खातिर वो मन अपन चेहरा ल जला के बदसूरत बनातिन काबर?
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सिकरनिन दाई ह हमर गाँव के रहवासी नइ रिहिस। हमर गाँव म कि हमर अतराब के परोसी गाँव मन म शिकारी जाति के एको परिवार नइ रिहिस। आजो नइ हे। हमर बड़का दाई ह बतावय – ’’सिकरनिन ह बसंतपुर म रहिथे। इंकर गाँव बसंतपुर हरे।’’
’’बसंतपुर? कते कर हे बसंतपुर ह?’’
’’नांदगाँव तीर हे।’’
’’तंय ह नांदगाँव जाथस त ऊँकर घर बइठेबर जाथस?’’
’’हमर सगा आवंय, गजब मार बइठेबर जाबोन।’’
’’हमर सगा नो हे। काकर सगा आवंय?’’
’’सिकरनिन के सगा सिकरनिन।’’
’’हमन का हरन?’’
’’हत् रे चेंधन। हमन का हरन, तंय नइ जानस?’’
’’बता न?’’ मंय ह जिद् कर देतेंव।
’’हमन तेली हरन बेटा, तेली।’’ बड़का दाई ह बतातिस।
’’हमन तेली हरन? …. वो ह सिकरनिनि काबर आय?’’
’’अपन-अपन करम-करनी। पूरब जनम के भाग ताय बेटा। जइसन करम करे रहिबे, तइसन जात म भगवान ह जनम देथे। अब अउ जादा झन पूछ। पूछबे ते चटकन परही। जा पढ़बे लिखबे।’’ बड़का दाई ह खिसियाके कहितिस।
’’पढ़े-लिखे ले का जाति म जनम धरहूँ?’’
’’तोर खंगेच् हे का रे’’ कहिके बड़का दई ह थपरा उठा के मोर कोती झपटे कस करतिस। मंय ह हाँसत-हाँसत खोर डहर भाग जातेंव।
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सिकरनिन दाई के रंग ह सांवली रहय। मोला नइ लगय कि चूँदी म वो ह कभू कंघी-कोकई करत रिहिस होही। वोकर चूँदी ह बनेच, कनिहा के आवत ले रिहिस
होही, काबर कि वोकर खोपा ह बड़े अकन रहय। वो ह जब भी आतिस, खोपा बांध के आतिस। वोला बेनी गांथ के आवत मंय ह कभू नइ देखेंव। चूँदी ल छितराके आवत घला वोला कभू नइ देखेंव। टेहर्रा नइ ते भांटाफूल रंग के कोष्टउहाँ लुगरा पहिरे रहितिस। वो समय कोष्टउहाँ लुगरा के चलन रिहिस। बलाउज पहिरे के जादा चलन नइ रिहिस। वो ह बलाउज पहिरे कि नइ, नइ जानंव। टिकली, सिंदूर लगावय कि नहीं, वहू ल नइ जानंव। फेर मोर पक्का सुरता हे, वोकर चेहरा म, दूनों गाल म बड़े-बड़े जले के निशान रहय। एक तो वोकर बिरबिट ले बिलई चेहरा, ऊपर ले जले के निशान, कोई घला अनुमान लगा सकथे कि कतिक सुंदर रिहिस होही वो ह?
दाई के सुंदरता ले बेटा के का लेना-देना। फेर वोकर जले के निशान ह मोला बने नइ लागय। मंय ह वोला पूछंव – ’’दाई! ये ह का के निशान आय?’’
वो ह बात ल हाँस के टरका देय। जब-जब वो ह आतिस, मंय ह वोला जरूर पूछतेंव – ’’’’दाई! येे ह का के निशान आय?’’
जादा जिद करे में एक दिन वो ह बताइस, – ’’कढ़ाई के कड़कत तेल ह छिटक गे रिहिस बेटा। विही म जर गे रिहिस।’’
’’कढ़ाई के?’’ मोला विश्वास नइ होइस। ’’का रांधत रेहेस?’’ फेर पूछतेंव।
वो ह हाँस दिस। मतलब वो ह जरूर झूठ बोलत रिहिस। मंय ह फेर जिद करेंव – ’’बता न दाई, कामा जरे हे?’’
’’हमर मन के मुँहू ह अइसनेच् रहिथे बेटा।’’
’’जनम ले अइसनेच् हे?’’
’’हव गा, जनम ले अइसनेच हे।’’
’’दूसर मन के ह असन काबर नइ रहय?’’
’’भगवान जाने बेटा।’’
हमर बड़का दाई ह मोर सवाल करई म कंझा गे रहय, डपटत किहिस, ’’हत रे चेंधन। तोर अउ कोनों दूसर काम नइ हे? भग इहाँ ले।’’
मंय ह मन मार के चुप रहि गेंव।
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मोर सवाल ह जस के तस माड़े रहि गिस। जब ग्यारहवीं कक्षा म गेंव, तब हमर जीवविज्ञान के सर ह एक दिन हमला डार्विन के सिद्धांत बताइस। ’’प्रकृति के साथ जीवन संघर्ष में जीवों में अनुकूलन पैदा होता है। अनुकूलन के द्वारा अर्जित गुण पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता जाता है। इस तरह कई पीढ़ियों के बाद की संततियों में उनके मूल पूर्वज से बिलकुल अलग तरह के गुण और लक्षण विकसित हो जाते है और ये अपने पूर्वजों से पूरी तरह भिन्न दिखने लगते है। इस तरह से नई प्रजातियों का विकास होता है।’’ संग म वो सर ह एकठन सवाल अउ ढील दिस जउन ह डार्विन के सिद्धांत ल गलत साबित करे उपाय रिहिस – ’’परंतु भारतीय स्त्रियाँ सदियों से नाक-कान छिदाती आ रही हैं। यह गुण आज तक हस्तांतरित क्यों नहीं हुआ?’’
मंय ह सिकरनिन दाई के गालमन के दाग ल डार्विन के सिद्धांत के परिणाम मानके देखे लगेंव। फेर जब मंय ह कालेज म आयेंव तब हमर जीवविज्ञान के प्रोफेसर सर ह डार्विन के सिद्धांत ल अउ पढ़ाइस। संगे-संग भारतीय नारीमन के कान-नाक के छेद के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तातरित नइ होय के कारण ल घला समझाइस। वोमन बताइन – ’’डार्विन के अनुसार संततियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी केवल उन्हीं गुणों का हस्तातंरण होता है जो प्रकृति के संग जीवन संघर्ष में अनुकूलन के फलस्वरूप अर्जित किये जाते हैं। भारतीय स्त्रियों के नाक-कान छिदवाने का उनके जीवन संघर्ष के साथ कोई संबंध नहीं है। इसलिए इस गुण का हस्तातंरण नहीं हो पाया। ऐसे गुणों का हस्तातंरण नहीं होता।’’
एक घांव फेर मोर मन म सिकरनिन दाई के गालमन के दाग ह प्रगट होके उलझ गे। शिकारी जात के औरत-मर्द, सब बिलई-बिलवा होथें, काबर कि वोमन बारो महीना घाम-पियास म शिकार करेबर, दतवन काड़ी टोरेबर, गिंजरत रहिथें। घाम म रहि-रहिके वोमन करिया हो गे हें। फेर शिकारी जात के औरतमन के गाल के जले के दाग के येकर ले का संबंध? खाली औरतमन के चेहरा म ये दाग ह काबर? पुरूषमन के चेहरा म काबर नहीं? अब मंय ह जाने-सुने के लाइक हो गे रेहेंव। सिकरनिन दाई के आवई अब बंद चुके रिहिस। बड़का दाई ले पूछे म झिझक होवय। तब दिगर सियानमन ले ये सवाल के जवाब पूछे के शुरू करेंव। एक दिन गाँव के एक झन बुजरुग सियान बबा ह मोर सवाल के जवाब ल समझाइस। मोर सवाल ल सुनके पहिली तो वो निरक्षर सियान बबा ह मोर कालेज के पढ़ाई के गजब लानत-सलामत करिस; पढ़े-लिखे म कामचोरी करे के मोर ऊपर आरोप लगाइस। मन लगा के पढ़े के उपदेश दिस। अउ किहिस – ’’तुँहर किताब म येकर बारे म नइ लिखाय हे जी?’’
’’अइसन बात ह किताब मन म नइ लिखाय रहय बबा।’’
’’त का लिखाय रहिथे? लुवाठ? सुन, शिकारी जात के न घर, न गाँव। घुमइया जात। अउ ये दुनिया म, हमर समाज म, इंकरो ले बड़े-बड़े शिकारी जात के आदमी बसे हें रे बाबू। अइसन शिकारी, जउनमन ह आदमी के शिकार करथें। आदमी के इज्जत अउ मान-सनमान के शिकार करथें।’’
’’कइसन शिकार बबा?’’
’’अरे बुद्धू! बड़े-बड़े मालगुजार, मंडल-गँउटिया अउ अपन आप ल ऊँच जात समझनेवाला आदमीमन कोनों शिकारी ले कम होथंव जी? गाँव के कते गरीब-गुरबा के, कते छोटे जात के नारीमन के इज्जत के येमन शिकार नइ करत होहीं? काकर इज्जत के ये मन ह शिकार नइ करत होहीं। बेटीमन के मुड़ी म पानी घला नइ परन देवंय साले मन? तोरे गाँव के अदमी ला देख ले न जी। अब वोकर तीर न तो माल हे, न गुजर हे, तभो ले तो आगी म मूतत हे नीच ह।’’ बतावत-बतावत सियान बबा के चेहरा ह तमतमा गे। वोकर आँखी म दुनियाभर के दुख अउ पीरा हिलोर मारे लगिस। कंठ के आवाज ह कंठे म रुक गे। थोरिक देर रुक के बबा ह अपन कंठ म अटके, ये बड़े शिकारी मन के प्रति उपजे घृणा के भाव ल खखार के थूँकिस। अपन मन म उपजे पीरा अउ क्रोध के लहरा ल पीइस अउ फेर केहे लगिस – ’’गाँव म बसे किसानमन के बहू-बेटीमन तो बांचय नहीं बेटा, तब तो तंय ह जउन शिकारी जात के बात पूछथस कुबेर, उँकर कोन पुछंता हे बाबू? इंकर न घर, न गाँव। तब अपन बेटी-बहू के इज्जत ल ये मन कइसे बंचाय? इज्जत बंचाय खातिर ये शिकारी जात केमन ह बाबू, बेटी के जनम धरते सात ऊँकर मुँहू ल हँसिया तिपो के दाग देथें बेटा, ताकि उँकर बेटीमन बदसूरत हो जांय। डररावन दिखे लगंय, ताकि बड़े-बड़े मालगुजार, मंडल-गँउटिया अउ ऊँच जात के शिकारी आदमीमन के मन म ये मन ल देख के घिन पैदा हो जाय, अउ बेटीमन ह इंकर शिकार बने ले बांच जाय। समझेस ग?’’
बबा के जवाब सुन के मोरो हिरदे ह क्षोभ अउ वितृष्णा के भाव ले भर गे। जुबान नइ फूटिस। मुड़ी ल हलाके केहेंव – समझ गेंव बबा, समझ गेंव। अपन आप ल संभाले के बाद मंय ह बबा डहर देखेंव, वोकर निगाह ह अगास डहर सुन्न में अटक गे रहय। थोरिक देर चुप्पी ओढ़े के बाद बबा ह फेर किहिस -’’देख रे मनुवा, अब तो तंय ह गजब अकन पढ़-लिख डरेस। अब ये बातमन ल तंय ह अपन किताब म लिखबे अउ दुनिया ल पढ़ाबे’’
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आज न तो वो सियान बबा हे अउ न वो सिकरनिन दाई हर हे। फेर मोला वो बबा के बात ह भूले म नइ भुलाय। ये बात ल बतावत समय के वोकर चेहरा, वोकर चेहरा के भाव, वोकर आँखी म लहरावत दुख अउ पीरा के लहरा आजो जस के तस मोला दिखाई पड़ जाथे। अब तो वो सिकरनिन दाई ह घला नइ हे फेर वोकर चेहरा के वो दाग मन ह आजो मोर आँखी ले नइ जावय। सोचथंव – अपन नानचुक पिला के चेहरा ल हँसिया तिपो के आंकत-दागत समय वो दाई-ददामन ल कतका पीरा होवत रिहिस होही? नानचुक अबोध पिलामन, जउनमन अभी-अभी ये दुनिया म आँखी उघारे रहय, लकलकावत हँसिया म दागे के पीरा ल कइसे सहत रिहिन होहीं? वो बेटीमन बड़े हो के जब अपन बदसूरत चेहरा ल देखत रिहिन होहीं तब वोमन ल कतका पीरा होवत रिहिस होही? ये पीरा ल जिनगीभर वोमन कइसे ढोवत रिहिन होहीं?
डार्विन के सिद्धांत के बारे म सोचथंव। वोकर ’’विभिन्नताएँ एवं वंशागतिकी’’ के सिद्धांत ह हमर समाज के शूद्र वर्ण अउ दीगर छोटे जाति समाज के दिमाग ऊपर जरूर लागू होय हे, नइ ते वर्ण व्यवस्था के कारण उपजे ये समाज के मनखेमन के दिमाग म समाय हीनताबोध ह घर नइ कर पातिस। उंकर मन म ये प्रथा के विरोध करे साहस के लोप नइ होतिस। अत्याचार ल चुपचाप सहन करे के प्रवृत्ति उंकर दिमाग म नइ आतिस। जिनगीभर अपमान अउ दुख-पीरा सहि के जीये के ताकत वोमन म नइ आतिस।
सोचथंव कि डार्विन के ’’विभिन्नताएँ एवं वंशागतिकी’’ के सिद्धांत ह शिकारी जाति के बेटीमन ऊपर काबर लागू नइ होइस होही। लागू हो जातिस त उंकर अबोध बेटी मन ल लकलकावत हँसिया म दागे के पीरा ल सहन करे बर तो नइ पड़तिस। अपन विकृत चेहरा अउ वोकर पीरा ल जिंदगीभर धर के जीये ल तो नइ पड़तिस।
सिकरनिन दाई ल जब मंय ह वो दाग के बारे म पूछंव तब वो ह मोर बात ल हाँस के टार देवत रिहिस। वो ह काकर ऊपर हाँसत रिहिस होही? हमर समाज के घिनौना जाति-वर्ण प्रथा ऊपर कि अपन किस्मत के ऊपर? हमर समाज के उच्च वर्ण के चरित्रहीनता ल देखथव अउ शिकारी समाज के अपन चरित्र रक्षा खातिर अपन चेहरा ल लकलकावत हँसिया म दाग के विकृत करे के भाव ल देखथव अउ सोचथंव कि ये दोनों वर्ण म कोन वर्ण ह श्रेष्ठ हे?
सिकरनिन दाई के चरित्र के शुचिता के बारे म सोचथंव तब मोर मुड़ी ह वोकर छबि के सामने श्रद्धा ले नव जाथे।

कुबेर

फोटो गूगल से प्रतीकात्‍मक

संघरा-मिंझरा

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