लोककथा : कउंवा करिया काबर होईस

एक बखत के बात आय। एक झन मुनि के कुटिया म एकठन कौआ हे तऊन सुग्घर मुनि के तीर म रहिके जूठा-काठा खावत अपन जिनगी ल पहावत रहय। कहे जाथे कि ओ बेरा म कौआ के तन हा सादा रिहिस हे। एक दिन मुनि हा कौआ ल कहिथे, ‘हे कौआ मय तोर बर एक ठन बुता जोंगे हंव करबे का?’

Read more

फेर दुकाल आगे

आंखी होगे पानी-पानी मन हा मोर दुखागे रद्दा जोहत बरसा के आसाढ़ घलो सिरागे कइसे बदरा उड़ियात आही रूख-राई घलो कटागे अइसन हम का पाप करेन बरूण देव घलो रिसागे धान हा बोआये नईहे अऊ बियासी के बेरा आगे रद्दा जोहत बरसा के भुंइया घलो थर्रागे नई सुनावय टर-टर बोली लागे मेचका घलो नंदागे पूजा-पाठ ला करत-करत कुकुर घलो बिहागे

Read more
1 2