घाम बइसाख-जेठ के : कबिता

बइरी हमला संसों हे, बीता भर पेट के।खोई-खोई भुंज डरिस, घाम बइसाख जेठ के।तिपत हे भुइंया, तिपत हे छानी।तात-तात उसनत हे तरिया के पानी।मजा हे भइया इहां सेठ के।खोई-खोई….रचना हे जांगर, खेत म ढेलवानी।भुंजावत हे बइरी, कोंवर जिनगानी।बेसुध हे जिनगी, सुरता न चेत के।खोई-खोई….चलत हे झांझ, जरत हे भोंभरा।मन पंछी खोजत हे खोंदरा।पोट-पोट लागे घाम देख के।खोई-खोई….नइए दऊलत दाऊ, गरीब

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दमांद बाबू : कबिता

मही म रांधे हे, नोनी भुंज बघार के।ले-ले सुवाद, ‘दमांद बाबू’ भाजी बोहार के।डारे हे नोनी मिरचा के फोरन।कब चुरही हम्मन अगोरन।बघारे हे नोनी गोंदली डार के।ले ले… चेतावय दाई, बिगरे झन नोनी।माहंगी के भाजी, नई देइस पुरउनी।रांधबे नोनी सुग्घर झाड़-निमार के।ले-ले… मही-मही कही के, दाई पारे गोहार गा।गजब मिठाय हे भाजी बोहार गा।मत पूछव खरखरइ परसी दुआर के।ले-ले… दमांद

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