कहिनी : फंदी बेंदरा

सतजुगहा किस्सा ये, ओ पइत मनखे जनावर अउ चिरई-चिरगुन, सांप डेंड़ू, सबे मन एक दूसर के भाखा ओखरे बर जानंय। अपन अपन रीत रद्दा म चलयं। एक दूसर के सुख-दुख म ठाड़ होवय। सबे बर अपन भाखा हर सबले आगर अउ ओग्गर माने जावय। भाखा अउ किरिया तो जियई-मरई के ताग माने जावय। तभो ले कतकोन नवटिप्पा लंदी-फंदी घला राहंय। […]

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लोक कहिनी : ठोली बोली

छकड़ा भर खार पीये के जिनिस देख के सबे गांव वाला मन पनछाय धर लिन कब चूरय त कब सपेटन। ए क ठन गांव म नाऊ राहय। बड़ चतुरा अऊ चड़बांक। तइहा पइंत के कंथ ली आय। जाने ले तुंहरेच नी जाने ले तुंहरेच, गांव भर के हक-हुन्नर, मगनी, बरनी, छट्ठी, बरही अऊ कोनो घला चरझनियां बुता बर छड़ीदार राहय। […]

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