ठगही फेर सकरायेत

कहे क्रांति कबिराय, नकल ले झन धोका खाना कोलिहा मन ह ओढ़े हावंय, छत्तीसगढ़िया बाना। मीठ-मीठ गोठिया के भाई, मूरुख हमला बनाथे बासी चटनी हमला देथे, अउ काजू अपन उड़ाथे। बाहिर म बन शेरखान, बिकट बड़ाई अपन बतावै भीतर जाके चांटे तलुआ, नांउ जइसे तेल लगावै। आरएसएस ल कहत रहिस वो, अपन गोसंइया बदलिस कुरसी बदल गइस, ओकर दादा-भईया। चतुर बहुत चालक हे, वो सकरायेत ये मोर भाई छत्तीसगढ़िया भेख बनाके, ठगथे हमर कमाई। सकरायेत के गाड़ा-गाड़ा बधाई के संग – तमंचा रैपुरी

Read More

जाड़ के महीना

आ गे जाड के महीना , हाथ गोड जुडावत हे । कमरा ओढ के बबा ह , गोरसी ल दगावत हे । पानी ल छुत्ते साठ , हाथ ह झिनझिनावत हे । मुहूं म डारते साठ , दांत ह किनकिनावत हे । तेल फुल चुपर के , लइका ल सपटावत हे । कतको दवई करबे तब ले , नाक ह बोहावत हे । नावा बहुरिया घेरी बेरी , किरिम ल लगावत हे । पाउडर ल लगा लगाके , चेहरा ल चमकावत हे । गाल मुहूँ चटकत हावय , बोरोप्लस लगावत…

Read More