छत्तीसगढ़ी भासा बर सकारात्मक संवाद जरूरी हे

लोक म बोलचाल के भासा अपन-अपन स्थान विसेस म अलग-अलग होथे। अपन स्थानीय अउ जातीय गुन के आख्यान करथे। फेर प्रदेस अउ देस के भासा बनत खानी बेवहार म एकरूपता जरूरी हो जाथे। येला हम विविधता म एकरूपता भी कह सकत हन। बिलकुल इही बात बोलचाल के भासा अउ साहित्य के भासा अउ मानकीकरन भासा म लागू होथे। मानकीकृत छत्तीसगढ़ी […]

Continue reading »

छत्तीसगढ़ी भासा : उपेक्छा अउ अपेक्छा (एक कालजयी आलेख)

    हमर ये समय ल, जेमा हम जीयत हन जमों ला भुला जाय (स्मृति भंग) के समय कहे जा रहे हे। ए समय के मझ म बइठ के मैं सोचत हॅव के भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपन आज ल हमर काल बर सौंपे के बात कहत रहिन तउन ह छत्तीसगढ़ के तात्कालीन साहित्यकार मन बर फालतू गोठ असन रहिस […]

Continue reading »