हे राम : नारायण लाल परमार के नवगीत

दुनिया मां नइये कखरो ठिकाना – मनखे ठाढ सुखावत हे राम, मनखे ठाढ सुखावत हे राम। झन पूछ भइया हाले हवाल मारिस ढलत्ती येसो दुकाल पथरा होगे जिहाँ पछीना धुर्रा फकत उडा़वत हे राम। का पुन्नी का फागुन तिहार आठों पहर दिखै मुंधियार धरम इमान ह देखते देखत गजट बरोबर चिरावत हे राम। आँही बाँही नइये चिन्हार जतका दिखथे सबो

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पितर पाख मा साहित्यिक पुरखा मन के सुरता : नारायणलाल परमार

व्‍हाट्स एप ग्रुप साहित्‍यकार में श्री अरूण कुमार निगम भईया ह पितर पाख मा पुरखा मन के सुरता कड़ी म हमर पुरखा साहित्‍यकार मन के रचना प्रस्‍तुत करे रहिन हे जेला गुरतुर गोठ के पाठक मन बर सादर प्रस्‍तुत करत हन– अँखियन मोती मन के धन ला छीन पराइस टूटिस पलक के सीप उझरगे पसरा ओकर बाँचे हे दू चार

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