गीत : रामेश्वर शर्मा

सरर-सरर फरर-फरर बहे पुरवाही। सावन सवनाही तब धरती हरियाही॥ बूंद गिरे भुइयां मं सावन के झर-झर। बिजुरी के तड़-तड़ बादर के घड़-घड़। आगे बादर ले मउसम बदल जाही॥ देखव अब चारो डहर मन हरियावे। गावय मल्हार संग ददरिया सुनावे। लइका सियान सब गाही गुनगुनाही॥ बइला के संगे-संग खेत हर जोताही। लछमिन हर खेत मं बीजा बगराही। जिहां देख तिहां बूता […]

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