लघुकथा-किसान

एक झन साहब अउ ओकर लइका ह गांव घूमे बर आइन।एक ठ खेत म पसीना ले तरबतर अउ मइलाहा कपडा पहिर के बुता म रमे मनखे ल देखके ओकर लइका पूछथे-ये कोन हरे पापा? ये किसान हरे बेटा!!-वो साहब ह अपन बेटा ल बताइस। ‘ये काम काबर करत हे पापा?’ “ये अन्न उपजाय बर काम करत हे बेटा!” ‘ये मइलाहा कपडा काबर पहिरे हे पापा?’ “ये गरीब हे ते पाय के अइसन कपडा पहिरे हे बेटा!” ‘अच्छा!!त किसान ह गरीब होथे का पापा?’ “हहो!हमर देस के जादातर किसान गरीब हे…

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का होही?

बाढत नोनी के संसो म ददा के नींद भगा जाथे। कतको चतुरा रहिथे तेनो ह रिश्ता-नत्ता म ठगा जाथे। दू बीता के पेट म को जनी!! कतेक बड दाहरा खना जाथे। रात-दिन के कमई ह नी पूरय जतेक रहिथे जम्मो समा जाथे। दुब्बर बर दू असाढ करके मालिक ल घलो मजा आथे। लटपट-लटपट हमरे बर पूरथे तउनो म रोज सगा आथे। बइमान सब मउज करत हे साव मनखे ह सजा पाथे। आंखी मूंदके बैठे हे सब हंसा तभे करिया कउंवा जघा पाथे। रीझे यादव टेंगनाबासा(छुरा)

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