बरखा रानी

बहुत दिन ले नइ आए हस, काबर मॅुह फुलाए हस? ओ बरखा रानी! तोला कइसे मनावौंव? चीला चढ़ावौंव, धन भोलेनाथ मं जल चढ़ावौंव, गॉव के देवी-देवता मेर गोहरावौंव, धन कागज मं करोड़ों पेड़ लगावौंव। ओ बरखा रानी……? मॅुह फारे धरती, कलपत बिरवा, अल्लावत धान, सोरियावतन नदिया-नरवा, कल्लावत किसान… देख,का ल देखावौंव? ओ बरखा रानी…..? मैं कोन औं जेन तोला वोतका दूरिहा ले बलावत हौं? मानुस,पसु,पक्छी, पेड़-पउधा… वो जीव-निरजीव, जेखर जीवन,जरूरत, सुघरई अउ सार तैं, मैं तोर वोही दास आवौंव। ओ बरखा रानी! तोला कइसे मनावौंव? केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘ बरदुली,कबीरधाम…

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जल अमरित

पानी के बूँद पाके, हरिया जाथें, फुले, फरे लगथें पेड़ पउधा, अउ बनाथें सरग जस,धरती ल। पानी के बूँद पाके, नाचे लगथे, मजूर सुघ्घर, झम्मर झम्मर। पानी के बूँद पाए बर, घरती के भीतर परान बचाके राखे रहिथें टेटका, सांप, बिछी, बीजा, कांद-दूबी, अउ निकल जथें झट्ट ले पाके पानी के बूँद, नवा दुनिया देखे बर। पानी के सुवागत मं नाचथें फुरफून्दी, बत्तर कीरा। इसकूल घलोक करत रहिथे अगोरा पानी के खुले बर। पानी पाके लाइन घलोक हो जथे अंजोर, पहिली ले जादा। पानी ल पाके, किसान सुरु करथे काम…

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