नवा साल मं

महिना के का हे संगी हो? आत रइही-जात रइही, जनवरी,फरवरी…। साल के का हे संगी हो? आत रइथे-जात रइथे ये तो, …..दू हजार अठारा, दू हजार अठारा ले दू हजार ओन्नईस, ओन्नईस ले बीस,बीस ले….। बदलत रईही कलेंडर घलोक। महत्तम के बात हे संगवारी हो, हमर नइ बदलना। संगी हो, हमन मत बदलिन, हमर पियार झन बदलै, हमर संस्कार झन बदलै, जीए के अधार झन बदलै। केजवा राम साहू ‘तेजनाथ‘ बरदुली,कबीरधाम (छ.ग. ) 7999385846

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डर

सोंचथौं, कईसे होही वो बड़े-बड़े बिल्डिंग-बंगला, वो चमचमावत गाड़ी, वो कड़कड़ावत नोट, जेखर खातिर, हाथ-पैर मारत फिरथें सब दिन-रात, मार देथें कोनों ला नइ ते खुद ला? अरे! वो बिल्डिंग तो आवे ईंटा-पथरा के, कांछ के, वो कार तो आवै लोहा-टीना के, अउ कागज के वो नोट, वो गड्डी आवै। वो बिल्डिंग आह! डर लगथे के खा जाही मोला, वो कार, डर लगथे, वो जाही मोरे उपर सवार, डर लगथे पागल बना दिही मोला वो पइसा। डर लगथे निरजीव ईंटा-पथरा, कांछ, लोहा-टीना,कागज के बीच घिर के, निरलज्ज, निरजीव झन हो…

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