तंय उठथस सुरूज उथे

जिहां जाबे पाबे, बिपत के छांव रे।
हिरदे जुड़ा ले आजा मोर गांव रे।।
खेत म बसे हाबै करमा के तान।
झुमरत हाबै रे ठाढ़े-ठाढ़े धान।।
हिरदे ल चीरथे रे मया के बान।
जिनगी के आस हे रामे भगवान।।
पीपर कस सुख के परथे छांव रे।
हिरदे जुड़ा ले, आजा मोर गांव रे।
इहां के मनखे मन करथें बड़ बूता।
दाई मन दगदग ले पहिरे हें सूता।
किसान अउ गौंटिया, हाबैं रे पोठ।
घी-दही-दूध-पावत, सब्बो हें रोठ।
लेवना ल खोंच के ओमा नहांव रे।
हिरदे जुड़ा ले, आजा मोर गांव रे।
हवा हर उठाह के महमई बगराथे।
नदिया हर गाना के धुन ल सुनाथे।
सुरूज हर देथे, गियान के अंजोर।
दुा ल भगाथे, सुघ्घर चंदा मोर।
तरई कस भाग चमकय, का बतांव रे।
हिरदे जुड़ा ले, आजा मोर गांव रे।
मेहनत अउ जांगर जिहां हे बिसवास।
उघरा तन, उघरा मन, हाबै जिहां आस।
खेत म चूहत पछीना के किरिया।
सीता कस हाबैं, इहां के रे तिरिया।
ऐंच-पेंच जानै न, जानैं कुछु दांव रे।
हिरदे जुड़ा ले, आजा मोर गांव रे।

डॉ. विनय कुमार पाठक
अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग



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