कविता : वा रे मनखे

वा रे मनखे
रूख रई नदिया नरवा
सबो ल खा डरे
रूपिया- पैसा
धन-दोगानी, चांदी-सोना
सबो ल पा डरे
जीव-जंतु, कीरा-मकोरा
सब के हक ल मारत हस
आंखी नटेरे घेरी बेरी
ऊपर कोती ल ताकत हस
पानी नी गीरत हे
त तोला जियानत हे
फेर ए दुनिया के सबो परानी
ऊपरवाला के अमानत हे
तोर बिसवास म
पूरा पिरथी ल तोला दे दिस
अउ तें बनगे कैराहा-कपटी, लालची
अब भुगत
अपन करनी के सजा
ऊपरवाला ल लेवन दे मजा!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा (छुरा)

संघरा-मिंझरा

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